लेख


-    डॉ. राम सारस्वत

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः

गुरु मिलन को मैं गया, छोड़ माया अभिमान..!
जीवन धन्य धन्य हो गया, लाखों यज्ञ समान..!!

इस वर्ष गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर मल्लापुर (चातुर्मास स्थल २०२१) में आयोजन में भाग ले कर अपने आपको और बीकानेर सारस्वत समाज को धन्य किया।
चित्रापुर समाज के बंधुओं का आतिथ्य सत्कार और स्नेह से हम भावविभोर हो गए।
मात्र पाँच वर्षों के परिचय से ही ऐसा लगता है कि हमारा चित्रापुर सारस्वत समाज के साथ जन्म जन्मांतर का रिश्ता है और अबकी बार यह बात सिद्ध भी हो गई।
जब हम गुरुदेव के सानिध्य में कुटीर में बैठे थे तो गुरुराज ने हमारे समक्ष ही चित्रापुर मठ के दोनों वरिष्ठ वैदिकों (पुरोहित) को बुलाया और चित्रापुर समाज की वंशावली, गोत्र और इतिहास के बारे में चर्चा की तथा हम से भी गौत्र आदि की जानकारी ले कर वैदिकों को अवगत करवाया और निर्देश दिया कि सुबह आप पूरी जानकारी और अध्ययन कर मुझे अवगत करवायें।

सुबह ही वैदिकों ने बताया कि हमारा और आपका उद्गम एक ही है और गोत्र भी मिलते जुलते हैं।
ततपश्चात् गुरुपूर्णिमा के दिन आशीर्वचन में मठ के आराध्य भगवान भवानीशंकर से आज्ञा ले कर आधिकारिक रूप से घोषणा कर हमारे द्वारा उनके चरणों में समर्पित पूजा सामग्री स्वीकार की और कहा कि दोनों समाज आपस में मिल कर मानव कल्याण के कार्य करें तो दोनों समाजों का सांगोपांग विकास हो सकता है।

ये मेरे जीवन का सबसे अनमोल क्षण था और गुरुदेव के स्नेह और आशीर्वाद को शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता ...
हालांकि मठ द्वारा संचालित मानव कल्याण की गतिविधियों से हम अनभिज्ञ तो नहीं थे परंतु सतत सांमजस्य के अभाव में उत्तर क्षेत्र का साधक लाभान्वित नहीं हो पा रहा था,अबकी बार पूज्य स्वामी जी ने निर्देशित किया कि आप लोगों को भी इस पुनीत पावन यज्ञ में अपनी आहुति डालनी चाहिए और उसी दिन से हम चित्रापुर सारस्वत समाज के बंधु, भगिनि से सांमजस्य स्थापित करने के अपने प्रयास आरंभ कर दिये। सायुज्यम्, सत्संग आदि की मुख्य समितियों से नियमित संवाद स्थापित कर रहे हैं।

चूंकि बीकानेर, जोधपुर व उत्तर भारत के साधकों की भाषा हिन्दी है अतः आदरणीय शांतिश माम के निर्देशन में मठ की वेबसाइट में भी हिन्दी में सामग्री प्रेषण की योजनाएँ बन रही हैं। वेबसाइट के हिन्दी पेज "परिचयनम्" में भी अधिकाधिक सामग्री डालने की योजना है।

सरस्वती पुत्र सारस्वत समाज में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, बस पूज्य स्वामी जी के आशीर्वाद से उनको सामने लाने की आवश्यकता है, और उसी दिशा में सार्थक प्रयास कर रहे हैं। दोनों समाज अंगीकार हो कर निश्चित ही सफल होंगे ऐसी भगवान भवानीशंकर से प्रार्थना है,
  परम पूज्य गुरुदेव स्वामी सद्योजात शंकराश्रम जी के आशीर्वाद से चित्रापुर सारस्वत मठ व साधकों द्वारा संचालित "सायुज्यम्" तथा अन्य प्रकल्पों के संबंध में हम कई वर्चुअल बैठक कर चुके हैं तथा फोन पर भी परस्पर वार्तालाप अनवरत है।

 सायुज्यम् के ही अंग "सत्संग" प्रकल्प का आज गुरुवार ५/८/२०२१ सायं ७ बजे से ८ बजे तक प्रथम वर्चुअल भाग का आयोजन हुआ।
इसे आदरणीया शरयू पाच्ची ने आयोजित किया।
आदरणीया विजयलक्ष्मी पाच्ची द्वारा सभा आरंभ और सभा समाप्ति प्रार्थना का गायन किया गया तथा मेरे द्वारा दोहराया गया, सभी साधकों ने भी पीछे पीछे दोहरा कर सीखने का पूरा प्रयास किया ।
आदरणीय डॉक्टर गुलवाड़ी माम ने सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद, टीका और विश्लेषण कर बहुत ही सरल शब्दों मे समझा कर अनुग्रहीत किया,
आदरणीया कंठ कोकिला गौरी पादुकोण पाच्ची ने अपनी मधुर वाणी में गुरुदेव को समर्पित "गुरुशरणं" भजन का गायन किया जिसे मंजूजी ने कुशलता से दोहराया।
आदरणीया विजयलक्ष्मी पाच्ची ने सारस्वत इतिहास,  गुरु परंपरा व आद्य गुरुदेव परिज्ञानाश्रम स्वामी जी, श्रंगेरी मठ तथा देवी उद्धरण आदि तथा गौकर्ण मठ की स्थापना के इतिहास की बृहद् जानकारी दी।

जोधपुर से आदरणीय मनीषा कैलाश जी सारस्वत की सुपुत्री गरिमा सारस्वत ने अपनी सुमधुर वाणी में गुरुदेव की महिमा में भजन प्रस्तुत किया जो सभी को सम्मोहित कर गया। बेटी का प्रथम प्रयास बहुत ही स्तरीय और  शानदार था उस पर स्वामी जी का अनुग्रह रहे, ऐसी कामना करता हूँ।
उत्तर क्षेत्र से प्रथम प्रयास में ही काफी साधक जुड़े और उनको बहुत ही अच्छा महसूस हुआ। सभी को यह आभास हुआ कि हम एक दूसरे को सदियों से जानते हैं।
एक परिवार की तरह सौहार्दपूर्ण संवाद हृदय को छू गया।
अगले गुरुवार को और अधिक साधक सत्संग में भाग लें, ऐसा प्रयास किया जायेगा।
सत्संग में शामिल सभी साधकों का कोटिशः आभार🙏
हम सभी पर पूज्य गुरुदेव, भगवान भवानीशंकर एवं मां दुर्गा परमेश्वरी की कृपा बनी रहे..

सद्योजात की ली पहन, जिसने यहाँ कमीज..!

उपजे नहीं विचारों में, वहाँ विषैले बीज..!!

कोई त्रुटि हो तो क्षमाप्रार्थी,🙏
जयशंकर🙏
 

-    डॉ. राम सारस्वत

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः

 

पिछले चातुर्मास समारोह में जब हम मल्लापुर मठ गये थे, तब हम सभी ने परम पूज्य गुरुदेव  स्वामी सद्योजात शंकराश्रम जी से निवेदन किया, कि गुरुदेव आप बीकानेर पधारें,
तब उन्होंने स्नेहिल मुस्कान के साथ कहा कि मैं नहीं, आप लोग शिराली आइए।
हमने सहर्ष गुरुदेव के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया और उसी दिन से इस यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।

 

चूँकि आध्यात्म के माध्यम से सारस्वत समाज को एक नई दिशा देनी थी अतः हमने तय किया कि कम से कम दौ सौ साधकों के साथ हमें शिराली  जाना है।
हालांकि मन में कुछ शंकाएं भी थी लेकिन गुरुदेव के आशीर्वाद का पूरा संबल हमारे साथ था।
तैयारियाँ करते करते जैसे ही ३१ दिसंबर आई, दौसौ से अधिक साधक तैयार हो गए। अंत में तो यह स्थिति हो गई कि करीब पचास साधकों को हमें ससम्मान मना करना पड़ा, क्योंकि हमारे पास टिकट प्रबंधन २२५ साधकों का ही था। 

हाड़तोड़ माइनस वाली ठिठुरती सर्दी में भी ३१ दिसंबर को बीकानेर का रेल्वे प्रतीक्षालय खचाखच भरा हुआ था।

बीकानेर के प्रबुद्ध नागरिकों ने आराध्य भगवान भवानीशंकर, नरसिंह गिरी जी महाराज, स्वामी परिज्ञानाश्रम जी,स्वामी सद्योजात शंकराश्रमजी जय उद्घोष के साथ हमें रवाना किया। रेलगाड़ी की ३६ घंटे की यात्रा आध्यात्मिक, रमणीक स्थल दर्शन, भजन कीर्तन, भोजन प्रसादी आदि के साथ निर्विघ्न संपन्न हुई।
मुर्डेश्वर स्टेशन पर उतरते ही गुरु भ्राताओं व शिष्यों ने स्वागत में पलक पावड़े बिछा दिये और विभिन्न बसों से ससम्मान हमें चित्रापुर सारस्वत मठ ले जाया गया।
उनका आतिथ्य सत्कार देख कर सभी साधक भाव विह्वल हो गए।
मठ में बिताए तीन दिन मानो तीन क्षण में व्यतीत हो गए हो,ऐसा प्रतीत हुआ।
मठ में ध्यान, प्राणायम, पूजापाठ, प्राचीन म्यूजियम, पंचवटी दर्शन, गौशाला दर्शन, सरोवर दर्शन आदि विभिन्न आध्यात्मिक व आधिदैविक क्रियाकलापों से आत्ममुग्धी का अहसास हुआ।

 

 

 

इस शिविर में सबसे खास बात यह रही कि सात बार हमें परम पूज्य गुरुदेव स्वामी सद्योजात शंकराश्रमजी से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ। गुरुदेव के सात बार आशीर्वचन व दर्शन से साधक भाव विह्वल हो गए। नौ बड़भागी साधक गुरुदेव से मंत्रदीक्षा प्राप्त कर निहाल हो गए। बहुत से साधकों को पवित्र पादुका पूजन का अवसर भी प्राप्त हुआ।शिविर के अंतिम चरण में गुरुदेव द्वारा पंक्तिबद्ध रूप से चरणामृत , मंत्राक्षत, तीर्थ, भिक्षाप्रसादी, भिक्षाफल का वितरण किया गया ।
इस यात्रा में गुरुदेव की इतनी कृपा व स्नेहाशीष रहा कि शब्दों में पिरोना मुझ जैसे तुच्छ बुद्धि के मानव के लिए असंभव है।

 

 

विश्व प्रसिद्ध  मुर्डेश्वर महादेव मंदिर दर्शन, समुद्र तट पर आनन्द अनुभूति साधकों को परमानंद का अहसास करवा गई।
मुर्डेश्वर से बीकानेर की यात्रा प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य को निहारते हुए, भजन कीर्तन करते हुए अद्भुत रूप से संपन्न हुई।
रास्ते में पड़ने वाले विभिन्न स्टेशनों पर समाज के प्रबुद्ध लोगों द्वारा प्रसाद सामग्री व भावातिरेक स्वागत किया गया।
नोखा व बीकानेर के मध्य मैंने और संपत सारस्वत ने समाज के बुजुर्गों और माताओं से आशीर्वाद लिया तो उनकी आशीर्वाद रूपी भावनाओं को न तो शब्दों मे पिरोया जा सकता है और ना ही अभिव्यक्त किया जा सकता है।

ज्यों ही बीकानेर स्टेशन पर उतरे तो ढोल नगाड़ों और पुष्प वर्षा से जो स्वागत हुआ वो अकल्पनीय व अवर्णनीय है।
सभी साधकों को उनके गंतव्यों की ओर रवाना करके हमने बीकानेर स्टेशन छोडा़।
आध्यात्मिक चेतना का हमारा यह प्रथम प्रयास कल्पना से परे अति आनंद दायक, मन आत्मा और बुद्धि को बल प्रदान करने वाला रहा।
इस सफल आयोजन में हम हमारे प्रयासों को तुच्छ मानते हुए, भगवान भवानी शंकर, माँ दुर्गा परमेश्वरी, नरसिंह गिरी जी महाराज, स्वामी परिज्ञानाश्रम जी व हमारे पूज्य गुरुदेव स्वामी सद्योजात शंकराश्रमजी के आशीर्वाद में ही सर्व निहित व निर्विघ्न संपूर्ण हुआ।
 

डॉ. राम सारस्वत

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः


चातुर्मास संपन्न *सीमोल्लंघन* *समारोह" २०१७*

मुंबई पुणे द्रुतगामी राजमार्ग पर खंडाला व लोनावला के मध्य प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य से सुसज्जित कार्ला नगर स्थित "परिज्ञानाश्रम" व दुर्गा परमेश्वरी शक्तिपीठ में "सारस्वत मठाधीश सद्गुरु सद्योजात शंकराश्रम जी" के चातुर्मासोपरान्त सीमोल्लंघन महोत्सव धूमधाम से संपन्न हुआ ।

भवानीशंकर, माँ राजराजेश्वरी व पूज्य गुरुदेव की असीम कृपा से मुझे भी इस पुनीत पावन अवसर पर सपरिवार शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रथम दिवस शिवपूजा, द्वितीय दिवस देवी अनुष्ठान, तृतीय दिवस पादुका पूजन तथा गुरुदेव के पवित्र करकमलों से चरणामृत प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
तदुपरांत सैकड़ों सारस्वत दीक्षार्थियों के साथ नदी तट पर आदिगुरू शंकराचार्य का पूजन गुरुदेव के सानिध्य में संपन्न हुआ तथा स्वामीजी द्वारा नौकायान से नदी पार कर सीमोल्लंघन उपक्रम पूर्ण किया गया।

इसके बाद हमारा कारवाँ सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ "एकविरा मन्दिर पहुँचा वहाँ गुरुदेव के सानिध्य में देवी पूजन तथा आरती संपन्न हुई।
वहाँ कार्ला शहर के प्रशासन व गणमान्य नागरिकों द्वारा नागरिक अभिनंदन किया गया ।
तत्पश्चात् परम पूज्य  गुरुदेव ने आशीर्वचन द्वारा सभी साधकों को पावन किया।
श्री एकविरा शक्तिपीठ से भव्य रूप से सुसज्जित रथ में पूज्य गुरुदेव को सिंहासनारूढ़ करवा गाजे बाजे के साथ आश्रम तक तीन किलोमीटर लंबी शोभायात्रा निकाली गई।
रथ सिंहासनारूढ़ दैदीप्यमान गुरुदेव साक्षात् आदिगुरू शंकराचार्य सदृश दृष्टिगोचर हो रहे थे। सारस्वत अनुयायियों का अनुशासन व उमंग देखते ही बन रहा था।
शोभायात्रा के उपरांत हमें गुरुदेव  से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तथा उनके पवित्र कर कमलों से अमृत रूपी प्रसाद की प्राप्ति हुई।
तत्पश्चात् मंदिर परिसर में स्वामीजी द्वारा विश्व शांतिपाठ व आशीर्वचन हुए,
इस भव्य आयोजन के माध्यम से देश विदेश से पधारे सारस्वत बंधुओ से आत्मिक व स्नेहिल मिलन हुआ तथा एक व्यापक, सुसंस्कृत व आध्यात्मिक सारस्वत परिवार का अभिन्न अंग होने की गौरवान्वित अनुभूति हुई..!!
 

 

 

 

 
 

 

 

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः

जय शंकर


परम पूज्य स्वामीजी श्रीमद् सद्योजात शंकराश्रम् जी द्वारा २०२१ का चातुर्मास शक्तिपीठ *मल्लापुर* में संपन्न किया गया, हम पांच लोग गुरुपूर्णिमा पर मल्लापुर गये थे तथा *गुरुपूर्णिमा महोत्सव* में भाग लिया था, गुरुपूर्णिमा महोत्सव का विवरण पहले के आलेख में लिख चुका हूं, जब हम गुरुपूर्णिमा पर मल्लापुर गये थे, तब पूज्य गुरुदेव ने अत्यंत स्नेह से हमें संकल्पित किया था कि आपको *सीमोल्लंघन* पर भी आना होगा, गुरुराज के आदेश को शिरोधार्य करते हुए मैं और पवन लगभग ५० घंटे की रेल यात्रा करते हुए २०.९.२०२१ को प्रातःकाल मल्लापुर पहुंच गए, चूंकि कोविड प्रोटोकॉल की पाबंदियां थी अतः केवलमात्र प्रतिनिधि साधक ही इस अनुष्ठान हेतु पहुंचे थे,चित्रापुर सारस्वत भगिनी, बंधुओं का हमारे लिए आतिथ्य सत्कार अवर्णनीय है, मठ में पदार्पण होते ही समय इतनी तीव्र गति से दौड़ता है कि भान ही नहीं होता कब प्रातः कब अपरान्ह और कब सांय हो जाती है,मठ का दिव्य और अलौकिक वातावरण आत्मिक शांति की पराकाष्ठा होता है,
साधकों द्वारा चल रहे अनवरत स्तोत्रम् पठन और भजन कीर्तन एक दिव्य अनुभूति करवाते हैं, इनसे मानसिक, आत्मिक और कायिक दुर्बलता व नकारात्मक प्रभाव छूमन्तर हो जाते हैं,
२०.९.२०२१ को जैसे ही *पूज्य स्वामीजी* ने मठ में प्रवेश किया सभी साधक उनके दर्शन कर निहाल हो गए, पूजा अर्चना के उपरांत पूज्य श्री ने धर्मसभा को अत्यंत स्नेहिल मुस्कान के संबोधित किया, उनके द्वारा गायन किया गया भजन *ऐसा ही गुरु भावे....साधो* इतना कर्णप्रिय था, कि रोम रोम पुलकित हो गया, 
सभी साधकों ने पंक्तिबद्ध हो कर पूज्य गुरुदेव से चरणामृत और आशीर्वाद लिया, समापन पर पूज्यश्री ने एक जोशीला नाद (भगवान भवानीशंकर की जय हो) किया, जिससे सभी साधक जोश से भर गए, गुरुदेव का स्नेहिल व्यवहार और आत्मीय अंतरंगता से संवाद बरबस ही आकर्षित कर लेता है,और परमानंद की अनूभूति करवाता है, जैसे ही मेरी चिकित्सीय दृष्टि पूज्य स्वामीजी पर तो उनकी देह का ताम्र वर्ण देख कर आभास हुआ कि इस चातुर्मास में उन्होंने अथाह साधना, समाधि, तप और लंघन किया है, इस कोरोना काल में समाज व मानवता की रक्षार्थ पूज्यपाद ने कितनी कठिन तपस्या की है, यह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था, सुना है, कि आकाश मंडल में एक गुरु ग्रह है,  जब पृथ्वी से कोई ग्रह टकराकर पृथ्वी को क्षति पहुँचाने वाला होता है तो गुरु ग्रह पृथ्वी की अक्षुण्णता के लिए उस टकराने वाले अवांछनीय ग्रह को अपने में समाविष्ट कर लेता है, पृथ्वी पर मानव शरीर के रुप में प्राप्त गुरु भी शिष्यों के कल्याण के लिए ऐसा ही करते हैं, वह गुरु वर्तमान, भूत व भविष्य सब जानते हैं और उसी के अनुसार क्रीड़ा करते रहते हैं,

अपने पूज्य गुरु की गुरुत्व शक्ति को बढा़ने के लिए पात्र शिष्यों को अधिकाधिक साधना करनी चाहिए,

सांय को स्वामीजी *सीमोल्लंघन* हेतु आदिमठ गौकर्ण को रवाना हुए तथा उसी मार्ग स्थित नदी पर पूजन अर्चन कर चातुर्मास संपन्न किया, आदिमठ गौकर्ण में स्वामीजी का परंपरागत रूप से भव्य स्वागत किया गया तथा हम इस अद्भुत, अलौकिक दृश्य के साक्षी बने, आदिमठ में पूज्य गुरुदेव द्वारा संपूर्ण विधि विधान से पूजन किया गया तथा संक्षिप्त धर्मसभा को संबोधित किया गया, वहां एक  छः वर्षीय नन्ही बालिका द्वारा धाराप्रवाह स्तोत्र पठन पूज्यश्री को सुनाया गया जिससे स्वामी जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बालिका को मिष्ठान्न दे कर अनुग्रहीत किया,

२१.९.२१ को सांय *युवधारा* द्वारा एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया जिसमें युवधारा के युवाओं का उत्साह देखते ही बनता था, इस संध्या में पूज्यश्री ने हमसे बीकानेर से लाई भेंट (बीकानेरी गज्जक) स्वीकार की तथा सभा में बच्चों को वितरित भी की, पूज्य गुरुदेव ने BJS समाज की कुशलक्षेम पुछी तथा आगामी नवरात्रि कार्यक्रम कार्ला तथा उसके तुरन्त बाद माउंट आबू के कार्यक्रम में आमंत्रित कर अनुग्रहीत किया, सांस्कृतिक संध्या में प्रोजेक्टर के माध्यम से पूज्य स्वामीजी श्रीमद् परिज्ञानाश्रम जी का विदेश स्थित चातुर्मास का *चलचित्र* दिखाया गया तथा आदरणीया *मीरा पाच्ची* द्वारा अभिनीत लघु हास्य नाटिका(नवरात्रि) भी दिखाई गई,

चूंकि शाम को ८ बजे हमारी ट्रेन थी सो हमें न चाहते हुए भी विदाई लेनी पड़ी, सभी से हम सुखद यात्रा की कामना ले कर रवाना हो गए, सूरत स्टेशन पर गुरुभ्राता *अतुल माम* से छोटी सी मुलाकात ही भावविह्वल कर गई, तीसरे दिन दोपहर को हम खाजूवाला पहुंचे तब तक गुरुभ्राता भगिनि के सुखद यात्रा और पहुंच की जानकारी हेतु फोन आ रहे थे,

कोई त्रुटि हो तो क्षमाप्रार्थी
सादर..
डॉ. राम

 श्री वी.राजगोपाल भट माम, केशव सोराब माम और आशा अवस्थी पाच्ची के साथ अर्चना कुम्टा  पाच्ची द्वारा संकलित।  वीडियो और तस्वीरें - एससीएम अभिलेखागार

 

मकर संक्रांति, चित्रापुर सारस्वतों के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है, जिसे बहुत ही खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार पूरे भारतवर्ष में अन्य समुदायों द्वारा भी मनाया जाता है, और इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है - संक्रांति, उत्तरायण, लोहड़ी, पोंगल, खिचड़ी, माघी आदि।

 लगभग १७०० वर्ष पहले, मकर संक्रांति और शीतकालीन संक्रांति (उत्तरायण) एक ही दिन, २१ दिसंबर को पड़ी थी। पृथ्वी का अग्रगमन और नक्षत्र राशि के अनुसार कैलेंडर में ७२ वर्षों में लगभग १ दिन का परिवर्तन आ जाता है। इसके कारण, मकर संक्रांति लगातार, लेकिन बहुत धीरे-धीरे शीतकालीन संक्रांति (उत्तरायण) से दूर होती जाती है। मकर संक्रांति और उत्तरायण अलग-अलग त्यौहार होते हुए भी, मकर संक्रांति उत्तरायण का ही पर्याय है।

 मकर संक्रांति फसल की कटाई के मौसम के आरंभ का प्रतीक है। नई फसलों की पूजा और  कटाई कर आनंदपूर्वक उसे दूसरों के साथ साझा किया जाता है। यह समय है, ताजे कटे हुए अनाज को देवताओं को अर्पित कर, भोग चढाने के बाद स्वयं खाने का। ऐसा ही एक भोग है खिचड़ी। यह एक हल्का और आसानी से पचने वाला व्यंजन है जो एकता का प्रतीक है। ताजी कटी हुई फसल के चावल, दाल, मौसमी सब्जियाँ और मसालों सहित सभी सामग्रियों को एक साथ मिलाकर एक ही बर्तन में खिचड़ी को पकाया जाता है। मकर संक्रांति से संबंधित उत्सव-विधियाँ जीवन और पुनरुत्थान की प्रतीक हैं।

 'संक्रांति' या 'संक्रमण' शब्द का अर्थ है 'पारगमन' और यह किसी राशि विशेष में सूर्य की गति से संबंधित है। एक वर्ष में ऐसी १२ संक्रांति होती हैं, जिनमें से प्रत्येक कुल १२ राशियों में से किसी एक के अनुरूप होती है। पर इनमें से दो सबसे महत्वपूर्ण पारगमन, कर्कटा संक्रांति और मकर संक्रांति हैं, जब सूर्य क्रमशः कर्कटक और मकर राशि में प्रवेश करता है। 

मकर संक्रांति ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देती है। प्रत्येक नए दिन के साथ, सूर्य आकाश में दक्षिण से उत्तर की ओर गमन करता है। उत्तरायण के साथ, उत्तरी गोलार्ध में दिन लंबे हो जाते हैं। इसलिए यह त्योहार सूर्य देवता को समर्पित है।

उत्तरायण या देवायन को देवताओं के लिए दिन का समय कहा जाता है, और यह समय उपनयन (जनेऊ), विवाह, और देवकार्य जैसे होम/हवन, यज्ञ आदि के लिए सबसे शुभ माना जाता है। इस अनुकूल अवधि के दौरान साधक अतिरिक्त साधना, जैसे जप, ध्यान, स्वाध्याय आदि का अनुष्ठान करते हैं। दूसरी ओर कर्कटक संक्रांति, दक्षिणायन अथवा सूर्य के पित्रायण (दक्षिण की ओर गमन) को इंगित करती है और यह हमारे दिवंगत पूर्वजों का दिन का समय माना जाता है। अतः  इस समय में श्राद्ध, तर्पण, म्हाळ (महालया अमावस्या के लिए कोंकणी शब्द) जैसे कार्य किए जाते हैं।  इस अवधि के दौरान रात्रि का समय दिन की तुलना में लंबा होता है।

 

हम मकर संक्रांति कैसे मनाते हैं ... 

इस त्यौहार में, तिल (कोंकणी में तीळु) और गुड़ के मिश्रण से एक व्यंजन तैयार किया जाता है, जिसे कर्नाटक में  'एलु बेला' और महाराष्ट्र में ‘तिल्गुळ’ कहा जाता है, यह अधिक से अधिक लोगों को वितरित किया जाता है। इस तिल्गुळ को साझा करते हुए, कर्नाटक में कहते हैं ‘इल्लु बेला तिन्दु, वोल्ले माताडु' जो कि मराठी में 'तिल्गुळ घ्या, गोडगोड बोला' का समानार्थी है। इस प्रकार 

 तिल्गुळ लोगों के बीच स्नेहपूर्ण बंधन का प्रतीक है जिस तरह तिल भी गुड़ के साथ एक आदर्श संयोजन बनाते हैं। संस्कृत में, तेल के लिए शब्द 'स्नेह' है। ऐसा कहा जाता है कि तिल के बीज विष्णु और मृत्यु के देवता यम के पसीने की बूंदों से निकले, जिन्होंने उन्हें प्रसादित किया और इसलिए, वे पितृ-कार्य (जैसे श्राद्ध, तर्पण आदि) में अपरिहार्य हो गए। तिल के बीज तेल, कैल्शियम और खनिजों का एक समृद्ध स्रोत हैं, जिसके कारण सर्दियों में इनका उपयोग समुचित है।

 मकर संक्रांति पर, कई लोग गंगा जैसी पवित्र नदियों, या पवित्र झीलों के तट पर पारंपरिक डुबकी लगाने के लिए एकत्र होते हैं। अन्य लोग गंगा का आह्वान करते हुए, इस श्लोक का पाठ करते हुए घर पर ही स्नान करते हैं, मानो पवित्र नदी में ही डुबकी लगा रहे हों।

 गड़्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।  
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

 श्री चित्रापुर मठ - शिराली में, मठ के प्रवेश द्वार और प्रत्येक मंदिर को आम के पत्तों से बने तोरणों से सजाया जाता है। भक्त प्रत्येक मंदिर में तिल्गुळ चढ़ाते हैं और नित्यपूजा के दौरान सभी मंदिरों में पंचामृत रुद्राभिषेक किया जाता है। सभी मंदिरों में नैवेद्य के रूप में खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।
पतंग एक हिंदी शब्द है, पतंग उड़ाना सूर्य की उत्तरी यात्रा का प्रतीक है, और यह मकर संक्रांति पर युवाओं का अतिप्रिय खेल है। शिराली में, परम पूज्य सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी केम्ब्रे में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाने में युवाओं का साथ देते हैं।

 मकर संक्रांति आध्यात्मिक साधक को हमेशा सही दिशा में अग्रसर रहने का स्मरण दिलाती है - ठीक उसी तरह जिस तरह एक नाविक के कम्पास की सुई हमेशा उत्तर दिशा को इंगित करती है। इसी तरह, हमारी बुद्धि हमेशा सही और गलत के बीच चुनाव करने में विवेकशील होनी चाहिए, जो हमें हमारे अंतिम लक्ष्य, ब्रह्म की ओर सही रास्ते पर ले जाए।

अपने आशीर्वचन में परम पूज्य सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी ने साधक की, एक चरण से दूसरे चरण में क्रमिक आध्यात्मिक प्रगति की तुलना सूर्य के विभिन्न राशियों में से होने वाले संक्रमण से  की है, अर्थात् जीवन में सभी प्रकार की विभिन्न स्थितियों के माध्यम से सबक सीखते हुए लगातार विकसित होना।

 मकर संक्रांति एक नूतन प्रकाश को जीवन में प्रवेश की अनुमति देते हुए, अतीत को भूलने का एक सुअवसर है। यह हमें विभिन्न तरीकों से (जैसे गायत्री मंत्र) सूर्य देवता से प्रार्थना करने का अवसर  देती है। ज्ञान रूपी प्रकाश द्वारा हमारी बुद्धि का अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट हो, ऐसे आशीर्वाद की हम प्रार्थना करते हैं।