लेख


-    डॉ. राम सारस्वत

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः

गुरु मिलन को मैं गया, छोड़ माया अभिमान..!
जीवन धन्य धन्य हो गया, लाखों यज्ञ समान..!!

इस वर्ष गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर मल्लापुर (चातुर्मास स्थल २०२१) में आयोजन में भाग ले कर अपने आपको और बीकानेर सारस्वत समाज को धन्य किया।
चित्रापुर समाज के बंधुओं का आतिथ्य सत्कार और स्नेह से हम भावविभोर हो गए।
मात्र पाँच वर्षों के परिचय से ही ऐसा लगता है कि हमारा चित्रापुर सारस्वत समाज के साथ जन्म जन्मांतर का रिश्ता है और अबकी बार यह बात सिद्ध भी हो गई।
जब हम गुरुदेव के सानिध्य में कुटीर में बैठे थे तो गुरुराज ने हमारे समक्ष ही चित्रापुर मठ के दोनों वरिष्ठ वैदिकों (पुरोहित) को बुलाया और चित्रापुर समाज की वंशावली, गोत्र और इतिहास के बारे में चर्चा की तथा हम से भी गौत्र आदि की जानकारी ले कर वैदिकों को अवगत करवाया और निर्देश दिया कि सुबह आप पूरी जानकारी और अध्ययन कर मुझे अवगत करवायें।

सुबह ही वैदिकों ने बताया कि हमारा और आपका उद्गम एक ही है और गोत्र भी मिलते जुलते हैं।
ततपश्चात् गुरुपूर्णिमा के दिन आशीर्वचन में मठ के आराध्य भगवान भवानीशंकर से आज्ञा ले कर आधिकारिक रूप से घोषणा कर हमारे द्वारा उनके चरणों में समर्पित पूजा सामग्री स्वीकार की और कहा कि दोनों समाज आपस में मिल कर मानव कल्याण के कार्य करें तो दोनों समाजों का सांगोपांग विकास हो सकता है।

ये मेरे जीवन का सबसे अनमोल क्षण था और गुरुदेव के स्नेह और आशीर्वाद को शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता ...
हालांकि मठ द्वारा संचालित मानव कल्याण की गतिविधियों से हम अनभिज्ञ तो नहीं थे परंतु सतत सांमजस्य के अभाव में उत्तर क्षेत्र का साधक लाभान्वित नहीं हो पा रहा था,अबकी बार पूज्य स्वामी जी ने निर्देशित किया कि आप लोगों को भी इस पुनीत पावन यज्ञ में अपनी आहुति डालनी चाहिए और उसी दिन से हम चित्रापुर सारस्वत समाज के बंधु, भगिनि से सांमजस्य स्थापित करने के अपने प्रयास आरंभ कर दिये। सायुज्यम्, सत्संग आदि की मुख्य समितियों से नियमित संवाद स्थापित कर रहे हैं।

चूंकि बीकानेर, जोधपुर व उत्तर भारत के साधकों की भाषा हिन्दी है अतः आदरणीय शांतिश माम के निर्देशन में मठ की वेबसाइट में भी हिन्दी में सामग्री प्रेषण की योजनाएँ बन रही हैं। वेबसाइट के हिन्दी पेज "परिचयनम्" में भी अधिकाधिक सामग्री डालने की योजना है।

सरस्वती पुत्र सारस्वत समाज में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, बस पूज्य स्वामी जी के आशीर्वाद से उनको सामने लाने की आवश्यकता है, और उसी दिशा में सार्थक प्रयास कर रहे हैं। दोनों समाज अंगीकार हो कर निश्चित ही सफल होंगे ऐसी भगवान भवानीशंकर से प्रार्थना है,
  परम पूज्य गुरुदेव स्वामी सद्योजात शंकराश्रम जी के आशीर्वाद से चित्रापुर सारस्वत मठ व साधकों द्वारा संचालित "सायुज्यम्" तथा अन्य प्रकल्पों के संबंध में हम कई वर्चुअल बैठक कर चुके हैं तथा फोन पर भी परस्पर वार्तालाप अनवरत है।

 सायुज्यम् के ही अंग "सत्संग" प्रकल्प का आज गुरुवार ५/८/२०२१ सायं ७ बजे से ८ बजे तक प्रथम वर्चुअल भाग का आयोजन हुआ।
इसे आदरणीया शरयू पाच्ची ने आयोजित किया।
आदरणीया विजयलक्ष्मी पाच्ची द्वारा सभा आरंभ और सभा समाप्ति प्रार्थना का गायन किया गया तथा मेरे द्वारा दोहराया गया, सभी साधकों ने भी पीछे पीछे दोहरा कर सीखने का पूरा प्रयास किया ।
आदरणीय डॉक्टर गुलवाड़ी माम ने सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद, टीका और विश्लेषण कर बहुत ही सरल शब्दों मे समझा कर अनुग्रहीत किया,
आदरणीया कंठ कोकिला गौरी पादुकोण पाच्ची ने अपनी मधुर वाणी में गुरुदेव को समर्पित "गुरुशरणं" भजन का गायन किया जिसे मंजूजी ने कुशलता से दोहराया।
आदरणीया विजयलक्ष्मी पाच्ची ने सारस्वत इतिहास,  गुरु परंपरा व आद्य गुरुदेव परिज्ञानाश्रम स्वामी जी, श्रंगेरी मठ तथा देवी उद्धरण आदि तथा गौकर्ण मठ की स्थापना के इतिहास की बृहद् जानकारी दी।

जोधपुर से आदरणीय मनीषा कैलाश जी सारस्वत की सुपुत्री गरिमा सारस्वत ने अपनी सुमधुर वाणी में गुरुदेव की महिमा में भजन प्रस्तुत किया जो सभी को सम्मोहित कर गया। बेटी का प्रथम प्रयास बहुत ही स्तरीय और  शानदार था उस पर स्वामी जी का अनुग्रह रहे, ऐसी कामना करता हूँ।
उत्तर क्षेत्र से प्रथम प्रयास में ही काफी साधक जुड़े और उनको बहुत ही अच्छा महसूस हुआ। सभी को यह आभास हुआ कि हम एक दूसरे को सदियों से जानते हैं।
एक परिवार की तरह सौहार्दपूर्ण संवाद हृदय को छू गया।
अगले गुरुवार को और अधिक साधक सत्संग में भाग लें, ऐसा प्रयास किया जायेगा।
सत्संग में शामिल सभी साधकों का कोटिशः आभार🙏
हम सभी पर पूज्य गुरुदेव, भगवान भवानीशंकर एवं मां दुर्गा परमेश्वरी की कृपा बनी रहे..

सद्योजात की ली पहन, जिसने यहाँ कमीज..!

उपजे नहीं विचारों में, वहाँ विषैले बीज..!!

कोई त्रुटि हो तो क्षमाप्रार्थी,🙏
जयशंकर🙏
 

-    डॉ. राम सारस्वत

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः

 

पिछले चातुर्मास समारोह में जब हम मल्लापुर मठ गये थे, तब हम सभी ने परम पूज्य गुरुदेव  स्वामी सद्योजात शंकराश्रम जी से निवेदन किया, कि गुरुदेव आप बीकानेर पधारें,
तब उन्होंने स्नेहिल मुस्कान के साथ कहा कि मैं नहीं, आप लोग शिराली आइए।
हमने सहर्ष गुरुदेव के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया और उसी दिन से इस यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।

 

चूँकि आध्यात्म के माध्यम से सारस्वत समाज को एक नई दिशा देनी थी अतः हमने तय किया कि कम से कम दौ सौ साधकों के साथ हमें शिराली  जाना है।
हालांकि मन में कुछ शंकाएं भी थी लेकिन गुरुदेव के आशीर्वाद का पूरा संबल हमारे साथ था।
तैयारियाँ करते करते जैसे ही ३१ दिसंबर आई, दौसौ से अधिक साधक तैयार हो गए। अंत में तो यह स्थिति हो गई कि करीब पचास साधकों को हमें ससम्मान मना करना पड़ा, क्योंकि हमारे पास टिकट प्रबंधन २२५ साधकों का ही था। 

हाड़तोड़ माइनस वाली ठिठुरती सर्दी में भी ३१ दिसंबर को बीकानेर का रेल्वे प्रतीक्षालय खचाखच भरा हुआ था।

बीकानेर के प्रबुद्ध नागरिकों ने आराध्य भगवान भवानीशंकर, नरसिंह गिरी जी महाराज, स्वामी परिज्ञानाश्रम जी,स्वामी सद्योजात शंकराश्रमजी जय उद्घोष के साथ हमें रवाना किया। रेलगाड़ी की ३६ घंटे की यात्रा आध्यात्मिक, रमणीक स्थल दर्शन, भजन कीर्तन, भोजन प्रसादी आदि के साथ निर्विघ्न संपन्न हुई।
मुर्डेश्वर स्टेशन पर उतरते ही गुरु भ्राताओं व शिष्यों ने स्वागत में पलक पावड़े बिछा दिये और विभिन्न बसों से ससम्मान हमें चित्रापुर सारस्वत मठ ले जाया गया।
उनका आतिथ्य सत्कार देख कर सभी साधक भाव विह्वल हो गए।
मठ में बिताए तीन दिन मानो तीन क्षण में व्यतीत हो गए हो,ऐसा प्रतीत हुआ।
मठ में ध्यान, प्राणायम, पूजापाठ, प्राचीन म्यूजियम, पंचवटी दर्शन, गौशाला दर्शन, सरोवर दर्शन आदि विभिन्न आध्यात्मिक व आधिदैविक क्रियाकलापों से आत्ममुग्धी का अहसास हुआ।

 

 

 

इस शिविर में सबसे खास बात यह रही कि सात बार हमें परम पूज्य गुरुदेव स्वामी सद्योजात शंकराश्रमजी से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ। गुरुदेव के सात बार आशीर्वचन व दर्शन से साधक भाव विह्वल हो गए। नौ बड़भागी साधक गुरुदेव से मंत्रदीक्षा प्राप्त कर निहाल हो गए। बहुत से साधकों को पवित्र पादुका पूजन का अवसर भी प्राप्त हुआ।शिविर के अंतिम चरण में गुरुदेव द्वारा पंक्तिबद्ध रूप से चरणामृत , मंत्राक्षत, तीर्थ, भिक्षाप्रसादी, भिक्षाफल का वितरण किया गया ।
इस यात्रा में गुरुदेव की इतनी कृपा व स्नेहाशीष रहा कि शब्दों में पिरोना मुझ जैसे तुच्छ बुद्धि के मानव के लिए असंभव है।

 

 

विश्व प्रसिद्ध  मुर्डेश्वर महादेव मंदिर दर्शन, समुद्र तट पर आनन्द अनुभूति साधकों को परमानंद का अहसास करवा गई।
मुर्डेश्वर से बीकानेर की यात्रा प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य को निहारते हुए, भजन कीर्तन करते हुए अद्भुत रूप से संपन्न हुई।
रास्ते में पड़ने वाले विभिन्न स्टेशनों पर समाज के प्रबुद्ध लोगों द्वारा प्रसाद सामग्री व भावातिरेक स्वागत किया गया।
नोखा व बीकानेर के मध्य मैंने और संपत सारस्वत ने समाज के बुजुर्गों और माताओं से आशीर्वाद लिया तो उनकी आशीर्वाद रूपी भावनाओं को न तो शब्दों मे पिरोया जा सकता है और ना ही अभिव्यक्त किया जा सकता है।

ज्यों ही बीकानेर स्टेशन पर उतरे तो ढोल नगाड़ों और पुष्प वर्षा से जो स्वागत हुआ वो अकल्पनीय व अवर्णनीय है।
सभी साधकों को उनके गंतव्यों की ओर रवाना करके हमने बीकानेर स्टेशन छोडा़।
आध्यात्मिक चेतना का हमारा यह प्रथम प्रयास कल्पना से परे अति आनंद दायक, मन आत्मा और बुद्धि को बल प्रदान करने वाला रहा।
इस सफल आयोजन में हम हमारे प्रयासों को तुच्छ मानते हुए, भगवान भवानी शंकर, माँ दुर्गा परमेश्वरी, नरसिंह गिरी जी महाराज, स्वामी परिज्ञानाश्रम जी व हमारे पूज्य गुरुदेव स्वामी सद्योजात शंकराश्रमजी के आशीर्वाद में ही सर्व निहित व निर्विघ्न संपूर्ण हुआ।
 

डॉ. राम सारस्वत

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः


चातुर्मास संपन्न *सीमोल्लंघन* *समारोह" २०१७*

मुंबई पुणे द्रुतगामी राजमार्ग पर खंडाला व लोनावला के मध्य प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य से सुसज्जित कार्ला नगर स्थित "परिज्ञानाश्रम" व दुर्गा परमेश्वरी शक्तिपीठ में "सारस्वत मठाधीश सद्गुरु सद्योजात शंकराश्रम जी" के चातुर्मासोपरान्त सीमोल्लंघन महोत्सव धूमधाम से संपन्न हुआ ।

भवानीशंकर, माँ राजराजेश्वरी व पूज्य गुरुदेव की असीम कृपा से मुझे भी इस पुनीत पावन अवसर पर सपरिवार शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रथम दिवस शिवपूजा, द्वितीय दिवस देवी अनुष्ठान, तृतीय दिवस पादुका पूजन तथा गुरुदेव के पवित्र करकमलों से चरणामृत प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
तदुपरांत सैकड़ों सारस्वत दीक्षार्थियों के साथ नदी तट पर आदिगुरू शंकराचार्य का पूजन गुरुदेव के सानिध्य में संपन्न हुआ तथा स्वामीजी द्वारा नौकायान से नदी पार कर सीमोल्लंघन उपक्रम पूर्ण किया गया।

इसके बाद हमारा कारवाँ सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ "एकविरा मन्दिर पहुँचा वहाँ गुरुदेव के सानिध्य में देवी पूजन तथा आरती संपन्न हुई।
वहाँ कार्ला शहर के प्रशासन व गणमान्य नागरिकों द्वारा नागरिक अभिनंदन किया गया ।
तत्पश्चात् परम पूज्य  गुरुदेव ने आशीर्वचन द्वारा सभी साधकों को पावन किया।
श्री एकविरा शक्तिपीठ से भव्य रूप से सुसज्जित रथ में पूज्य गुरुदेव को सिंहासनारूढ़ करवा गाजे बाजे के साथ आश्रम तक तीन किलोमीटर लंबी शोभायात्रा निकाली गई।
रथ सिंहासनारूढ़ दैदीप्यमान गुरुदेव साक्षात् आदिगुरू शंकराचार्य सदृश दृष्टिगोचर हो रहे थे। सारस्वत अनुयायियों का अनुशासन व उमंग देखते ही बन रहा था।
शोभायात्रा के उपरांत हमें गुरुदेव  से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तथा उनके पवित्र कर कमलों से अमृत रूपी प्रसाद की प्राप्ति हुई।
तत्पश्चात् मंदिर परिसर में स्वामीजी द्वारा विश्व शांतिपाठ व आशीर्वचन हुए,
इस भव्य आयोजन के माध्यम से देश विदेश से पधारे सारस्वत बंधुओ से आत्मिक व स्नेहिल मिलन हुआ तथा एक व्यापक, सुसंस्कृत व आध्यात्मिक सारस्वत परिवार का अभिन्न अंग होने की गौरवान्वित अनुभूति हुई..!!
 

 

 

 

 
 

 

 

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः
श्री भवानीशंकराय नमः
श्री मात्रे नमः

जय शंकर


परम पूज्य स्वामीजी श्रीमद् सद्योजात शंकराश्रम् जी द्वारा २०२१ का चातुर्मास शक्तिपीठ *मल्लापुर* में संपन्न किया गया, हम पांच लोग गुरुपूर्णिमा पर मल्लापुर गये थे तथा *गुरुपूर्णिमा महोत्सव* में भाग लिया था, गुरुपूर्णिमा महोत्सव का विवरण पहले के आलेख में लिख चुका हूं, जब हम गुरुपूर्णिमा पर मल्लापुर गये थे, तब पूज्य गुरुदेव ने अत्यंत स्नेह से हमें संकल्पित किया था कि आपको *सीमोल्लंघन* पर भी आना होगा, गुरुराज के आदेश को शिरोधार्य करते हुए मैं और पवन लगभग ५० घंटे की रेल यात्रा करते हुए २०.९.२०२१ को प्रातःकाल मल्लापुर पहुंच गए, चूंकि कोविड प्रोटोकॉल की पाबंदियां थी अतः केवलमात्र प्रतिनिधि साधक ही इस अनुष्ठान हेतु पहुंचे थे,चित्रापुर सारस्वत भगिनी, बंधुओं का हमारे लिए आतिथ्य सत्कार अवर्णनीय है, मठ में पदार्पण होते ही समय इतनी तीव्र गति से दौड़ता है कि भान ही नहीं होता कब प्रातः कब अपरान्ह और कब सांय हो जाती है,मठ का दिव्य और अलौकिक वातावरण आत्मिक शांति की पराकाष्ठा होता है,
साधकों द्वारा चल रहे अनवरत स्तोत्रम् पठन और भजन कीर्तन एक दिव्य अनुभूति करवाते हैं, इनसे मानसिक, आत्मिक और कायिक दुर्बलता व नकारात्मक प्रभाव छूमन्तर हो जाते हैं,
२०.९.२०२१ को जैसे ही *पूज्य स्वामीजी* ने मठ में प्रवेश किया सभी साधक उनके दर्शन कर निहाल हो गए, पूजा अर्चना के उपरांत पूज्य श्री ने धर्मसभा को अत्यंत स्नेहिल मुस्कान के संबोधित किया, उनके द्वारा गायन किया गया भजन *ऐसा ही गुरु भावे....साधो* इतना कर्णप्रिय था, कि रोम रोम पुलकित हो गया, 
सभी साधकों ने पंक्तिबद्ध हो कर पूज्य गुरुदेव से चरणामृत और आशीर्वाद लिया, समापन पर पूज्यश्री ने एक जोशीला नाद (भगवान भवानीशंकर की जय हो) किया, जिससे सभी साधक जोश से भर गए, गुरुदेव का स्नेहिल व्यवहार और आत्मीय अंतरंगता से संवाद बरबस ही आकर्षित कर लेता है,और परमानंद की अनूभूति करवाता है, जैसे ही मेरी चिकित्सीय दृष्टि पूज्य स्वामीजी पर तो उनकी देह का ताम्र वर्ण देख कर आभास हुआ कि इस चातुर्मास में उन्होंने अथाह साधना, समाधि, तप और लंघन किया है, इस कोरोना काल में समाज व मानवता की रक्षार्थ पूज्यपाद ने कितनी कठिन तपस्या की है, यह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था, सुना है, कि आकाश मंडल में एक गुरु ग्रह है,  जब पृथ्वी से कोई ग्रह टकराकर पृथ्वी को क्षति पहुँचाने वाला होता है तो गुरु ग्रह पृथ्वी की अक्षुण्णता के लिए उस टकराने वाले अवांछनीय ग्रह को अपने में समाविष्ट कर लेता है, पृथ्वी पर मानव शरीर के रुप में प्राप्त गुरु भी शिष्यों के कल्याण के लिए ऐसा ही करते हैं, वह गुरु वर्तमान, भूत व भविष्य सब जानते हैं और उसी के अनुसार क्रीड़ा करते रहते हैं,

अपने पूज्य गुरु की गुरुत्व शक्ति को बढा़ने के लिए पात्र शिष्यों को अधिकाधिक साधना करनी चाहिए,

सांय को स्वामीजी *सीमोल्लंघन* हेतु आदिमठ गौकर्ण को रवाना हुए तथा उसी मार्ग स्थित नदी पर पूजन अर्चन कर चातुर्मास संपन्न किया, आदिमठ गौकर्ण में स्वामीजी का परंपरागत रूप से भव्य स्वागत किया गया तथा हम इस अद्भुत, अलौकिक दृश्य के साक्षी बने, आदिमठ में पूज्य गुरुदेव द्वारा संपूर्ण विधि विधान से पूजन किया गया तथा संक्षिप्त धर्मसभा को संबोधित किया गया, वहां एक  छः वर्षीय नन्ही बालिका द्वारा धाराप्रवाह स्तोत्र पठन पूज्यश्री को सुनाया गया जिससे स्वामी जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बालिका को मिष्ठान्न दे कर अनुग्रहीत किया,

२१.९.२१ को सांय *युवधारा* द्वारा एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया जिसमें युवधारा के युवाओं का उत्साह देखते ही बनता था, इस संध्या में पूज्यश्री ने हमसे बीकानेर से लाई भेंट (बीकानेरी गज्जक) स्वीकार की तथा सभा में बच्चों को वितरित भी की, पूज्य गुरुदेव ने BJS समाज की कुशलक्षेम पुछी तथा आगामी नवरात्रि कार्यक्रम कार्ला तथा उसके तुरन्त बाद माउंट आबू के कार्यक्रम में आमंत्रित कर अनुग्रहीत किया, सांस्कृतिक संध्या में प्रोजेक्टर के माध्यम से पूज्य स्वामीजी श्रीमद् परिज्ञानाश्रम जी का विदेश स्थित चातुर्मास का *चलचित्र* दिखाया गया तथा आदरणीया *मीरा पाच्ची* द्वारा अभिनीत लघु हास्य नाटिका(नवरात्रि) भी दिखाई गई,

चूंकि शाम को ८ बजे हमारी ट्रेन थी सो हमें न चाहते हुए भी विदाई लेनी पड़ी, सभी से हम सुखद यात्रा की कामना ले कर रवाना हो गए, सूरत स्टेशन पर गुरुभ्राता *अतुल माम* से छोटी सी मुलाकात ही भावविह्वल कर गई, तीसरे दिन दोपहर को हम खाजूवाला पहुंचे तब तक गुरुभ्राता भगिनि के सुखद यात्रा और पहुंच की जानकारी हेतु फोन आ रहे थे,

कोई त्रुटि हो तो क्षमाप्रार्थी
सादर..
डॉ. राम

 श्री वी.राजगोपाल भट माम, केशव सोराब माम और आशा अवस्थी पाच्ची के साथ अर्चना कुम्टा  पाच्ची द्वारा संकलित।  वीडियो और तस्वीरें - एससीएम अभिलेखागार

 

मकर संक्रांति, चित्रापुर सारस्वतों के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है, जिसे बहुत ही खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार पूरे भारतवर्ष में अन्य समुदायों द्वारा भी मनाया जाता है, और इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है - संक्रांति, उत्तरायण, लोहड़ी, पोंगल, खिचड़ी, माघी आदि।

 लगभग १७०० वर्ष पहले, मकर संक्रांति और शीतकालीन संक्रांति (उत्तरायण) एक ही दिन, २१ दिसंबर को पड़ी थी। पृथ्वी का अग्रगमन और नक्षत्र राशि के अनुसार कैलेंडर में ७२ वर्षों में लगभग १ दिन का परिवर्तन आ जाता है। इसके कारण, मकर संक्रांति लगातार, लेकिन बहुत धीरे-धीरे शीतकालीन संक्रांति (उत्तरायण) से दूर होती जाती है। मकर संक्रांति और उत्तरायण अलग-अलग त्यौहार होते हुए भी, मकर संक्रांति उत्तरायण का ही पर्याय है।

 मकर संक्रांति फसल की कटाई के मौसम के आरंभ का प्रतीक है। नई फसलों की पूजा और  कटाई कर आनंदपूर्वक उसे दूसरों के साथ साझा किया जाता है। यह समय है, ताजे कटे हुए अनाज को देवताओं को अर्पित कर, भोग चढाने के बाद स्वयं खाने का। ऐसा ही एक भोग है खिचड़ी। यह एक हल्का और आसानी से पचने वाला व्यंजन है जो एकता का प्रतीक है। ताजी कटी हुई फसल के चावल, दाल, मौसमी सब्जियाँ और मसालों सहित सभी सामग्रियों को एक साथ मिलाकर एक ही बर्तन में खिचड़ी को पकाया जाता है। मकर संक्रांति से संबंधित उत्सव-विधियाँ जीवन और पुनरुत्थान की प्रतीक हैं।

 'संक्रांति' या 'संक्रमण' शब्द का अर्थ है 'पारगमन' और यह किसी राशि विशेष में सूर्य की गति से संबंधित है। एक वर्ष में ऐसी १२ संक्रांति होती हैं, जिनमें से प्रत्येक कुल १२ राशियों में से किसी एक के अनुरूप होती है। पर इनमें से दो सबसे महत्वपूर्ण पारगमन, कर्कटा संक्रांति और मकर संक्रांति हैं, जब सूर्य क्रमशः कर्कटक और मकर राशि में प्रवेश करता है। 

मकर संक्रांति ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देती है। प्रत्येक नए दिन के साथ, सूर्य आकाश में दक्षिण से उत्तर की ओर गमन करता है। उत्तरायण के साथ, उत्तरी गोलार्ध में दिन लंबे हो जाते हैं। इसलिए यह त्योहार सूर्य देवता को समर्पित है।

उत्तरायण या देवायन को देवताओं के लिए दिन का समय कहा जाता है, और यह समय उपनयन (जनेऊ), विवाह, और देवकार्य जैसे होम/हवन, यज्ञ आदि के लिए सबसे शुभ माना जाता है। इस अनुकूल अवधि के दौरान साधक अतिरिक्त साधना, जैसे जप, ध्यान, स्वाध्याय आदि का अनुष्ठान करते हैं। दूसरी ओर कर्कटक संक्रांति, दक्षिणायन अथवा सूर्य के पित्रायण (दक्षिण की ओर गमन) को इंगित करती है और यह हमारे दिवंगत पूर्वजों का दिन का समय माना जाता है। अतः  इस समय में श्राद्ध, तर्पण, म्हाळ (महालया अमावस्या के लिए कोंकणी शब्द) जैसे कार्य किए जाते हैं।  इस अवधि के दौरान रात्रि का समय दिन की तुलना में लंबा होता है।

 

हम मकर संक्रांति कैसे मनाते हैं ... 

इस त्यौहार में, तिल (कोंकणी में तीळु) और गुड़ के मिश्रण से एक व्यंजन तैयार किया जाता है, जिसे कर्नाटक में  'एलु बेला' और महाराष्ट्र में ‘तिल्गुळ’ कहा जाता है, यह अधिक से अधिक लोगों को वितरित किया जाता है। इस तिल्गुळ को साझा करते हुए, कर्नाटक में कहते हैं ‘इल्लु बेला तिन्दु, वोल्ले माताडु' जो कि मराठी में 'तिल्गुळ घ्या, गोडगोड बोला' का समानार्थी है। इस प्रकार 

 तिल्गुळ लोगों के बीच स्नेहपूर्ण बंधन का प्रतीक है जिस तरह तिल भी गुड़ के साथ एक आदर्श संयोजन बनाते हैं। संस्कृत में, तेल के लिए शब्द 'स्नेह' है। ऐसा कहा जाता है कि तिल के बीज विष्णु और मृत्यु के देवता यम के पसीने की बूंदों से निकले, जिन्होंने उन्हें प्रसादित किया और इसलिए, वे पितृ-कार्य (जैसे श्राद्ध, तर्पण आदि) में अपरिहार्य हो गए। तिल के बीज तेल, कैल्शियम और खनिजों का एक समृद्ध स्रोत हैं, जिसके कारण सर्दियों में इनका उपयोग समुचित है।

 मकर संक्रांति पर, कई लोग गंगा जैसी पवित्र नदियों, या पवित्र झीलों के तट पर पारंपरिक डुबकी लगाने के लिए एकत्र होते हैं। अन्य लोग गंगा का आह्वान करते हुए, इस श्लोक का पाठ करते हुए घर पर ही स्नान करते हैं, मानो पवित्र नदी में ही डुबकी लगा रहे हों।

 गड़्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।  
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

 श्री चित्रापुर मठ - शिराली में, मठ के प्रवेश द्वार और प्रत्येक मंदिर को आम के पत्तों से बने तोरणों से सजाया जाता है। भक्त प्रत्येक मंदिर में तिल्गुळ चढ़ाते हैं और नित्यपूजा के दौरान सभी मंदिरों में पंचामृत रुद्राभिषेक किया जाता है। सभी मंदिरों में नैवेद्य के रूप में खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।
पतंग एक हिंदी शब्द है, पतंग उड़ाना सूर्य की उत्तरी यात्रा का प्रतीक है, और यह मकर संक्रांति पर युवाओं का अतिप्रिय खेल है। शिराली में, परम पूज्य सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी केम्ब्रे में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाने में युवाओं का साथ देते हैं।

 मकर संक्रांति आध्यात्मिक साधक को हमेशा सही दिशा में अग्रसर रहने का स्मरण दिलाती है - ठीक उसी तरह जिस तरह एक नाविक के कम्पास की सुई हमेशा उत्तर दिशा को इंगित करती है। इसी तरह, हमारी बुद्धि हमेशा सही और गलत के बीच चुनाव करने में विवेकशील होनी चाहिए, जो हमें हमारे अंतिम लक्ष्य, ब्रह्म की ओर सही रास्ते पर ले जाए।

अपने आशीर्वचन में परम पूज्य सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी ने साधक की, एक चरण से दूसरे चरण में क्रमिक आध्यात्मिक प्रगति की तुलना सूर्य के विभिन्न राशियों में से होने वाले संक्रमण से  की है, अर्थात् जीवन में सभी प्रकार की विभिन्न स्थितियों के माध्यम से सबक सीखते हुए लगातार विकसित होना।

 मकर संक्रांति एक नूतन प्रकाश को जीवन में प्रवेश की अनुमति देते हुए, अतीत को भूलने का एक सुअवसर है। यह हमें विभिन्न तरीकों से (जैसे गायत्री मंत्र) सूर्य देवता से प्रार्थना करने का अवसर  देती है। ज्ञान रूपी प्रकाश द्वारा हमारी बुद्धि का अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट हो, ऐसे आशीर्वाद की हम प्रार्थना करते हैं।  
    
 

लेखक - धर्मप्रचारक श्री वी. राजगोपाल भट माम 
चित्रकला - कु.मिताली यु. राव

 

 रथसप्तमी का त्यौहार दैदीप्यमान सूर्य को समर्पित है, जिसके बिना पृथ्वी पर जीवन असंभव है। सूर्य को वास्तव में जीवन और प्राण शक्ति का स्रोत कहा जा सकता है। वेदों में वर्णित जीवन शैली के अनुयायी, हमारे पूर्वजों ने वेदों और उपनिषदों में इस प्रकाशमान दिव्य ग्रह की महिमा का बखान किया है।  पवित्र गायत्री मंत्र अपने आप में परमात्मा का आवाहन है जिसकी परिकल्पना सूर्य में की जाती है।  "वह परमात्मा जो सूर्य में है, वह परमात्मा मैं ही हूँ!"  उपनिषद् ऐसी घोषणा करते हैं।

हमारी संस्कृति में सूर्यदेवता, “सूर्य नारायण” के रूप में पूजनीय हैं। माघ शुक्ल सप्तमी को मनाई जाने वाली रथसप्तमी, उनके प्रति आभार प्रकट करने का त्यौहार है।

वेदों में सूर्य को आकाश मार्ग में एक सुनहरे रथ में परिभ्रमण करते हुए कल्पित किया गया है।  "हिरण्मयेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्,"  यह पुरातन मंत्र ऐसी घोषणा करता है।  कहा जाता है कि इस रथ में १२ पहिए होते हैं, जो ३६०-डिग्री राशि चक्र की, ३० डिग्री प्रति राशि वाली, १२ राशियों के प्रतीक हैं और एक संपूर्ण वर्ष का संकलन करते हैं, जिसे “संवत्सर” कहा जाता है। पंचांग में सूर्य का अपना निवास स्थान "सिंह" राशि है और वह प्रति मास एक राशि से दूसरी राशि तक परिभ्रमण करता है। इस संपूर्ण चक्र को पूरा होने में ३६५ दिन लगते हैं।  रथसप्तमी समारोह प्राणदाता सूर्य से प्राप्त होने वाली दिव्य ऊर्जा और प्रकाश का आवाहन करता  है।

 सात का अंक सूर्यदेव का प्रिय अंक माना जाता है।  सात घोड़ों से जुते हुए रथ के स्वामी होने के कारण उन्हें ‘सप्ताश्व’ भी कहा जाता है। ये घोड़े इंद्रधनुषी रंगावली (विब्ग्योर) के सात रंगों के प्रतीक माने जाते हैं। सप्ताह में सात दिन होते हैं, जिनमें से प्रत्येक दिन का स्वागत सूर्योदय से होता है।  रथसप्तमी मनाने वाले भक्त पारंपरिक तौर पर सात व्यंजनों का भोग चढ़ाते हैं।

सम्पूर्ण भारतवर्ष में रथसप्तमी, क्रमशः तापमान में वृद्धि और वसंत के भावी आगमन का प्रतीक है, जिसे आगामी चैत्र के महीने में युगादि या हिंदू चंद्रमान नव वर्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 रथसप्तमी, सूर्य जयंती के नाम से भी जानी जाती है। इस दिन को वैवस्वत् (विवस्वान्  अर्थात् सूर्य) मन्वन्तर का आरंभ भी माना जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी दिन कश्यप और अदिति के घर सूर्यदेव का जन्म हुआ था।

रथसप्तमी पर पारंपरिक पूजा का शुभारंभ सूर्य की मूर्ति को केसर, पुष्प और ‘अर्क’ नामक पौधे (रूई पान - कोंकणी में) की सात पत्तियों से सजाकर किया जाता है।  भोर की बेला में किसी सरोवर या नदी में स्नान, विशेष रूप से निर्धारित है। इस कृतज्ञतापूर्ण आभार के प्रकटन से अर्जित पुण्य स्थायी अर्थात् अचल माना जाता है और इसलिए इस शुभ दिन को अचला सप्तमी भी कहते हैं।  यह भी कहा जाता है कि यह पुण्य पिछले सात जन्मों के पापों को मिटा देता है तथा मातृपक्ष और पितृपक्ष, दोनों के पूर्वजों की सात पीढ़ियों को आशीर्वाद प्रदान करता है। 

मंत्रोच्चारण के साथ सूर्य को तर्पण दिया जाता है।  रथसप्तमी पर पाठ के लिए आदर्श स्तोत्र हैं - आदित्य हृदय, सूर्याष्टक, सूर्य-सहस्रनाम और सूर्यमंडल स्तोत्र।  मैसूर और मेल्कोटे  जैसे स्थानों में, सूर्यदेवता के प्रतीक सूर्यमंडल के साथ भव्य जुलूस निकाले जाते हैं।  मंगलूरु में श्री वेंकटरमण मंदिर के भगवान वीर वेंकटेश का वार्षिक रथोत्सव भी इसी दिन आयोजित किया जाता है और इसे प्रेम से ‘कोडियाल तेरु’ कहा जाता है।

 रथसप्तमी हम चित्रापुर सारस्वतों के लिए और भी अधिक विशेष महत्व रखती है।  इस शुभ दिन पर ही हमें गोकर्ण के कोटितीर्थ पर अपने प्रथम गुरु परम पूज्य श्रीमत् परिज्ञानाश्रम स्वामी जी (प्रथम) प्राप्त हुए थे। 

जैसा कि श्री चित्रापुर गुरुपरंपरा चरित्र ग्रन्थ (अध्याय ३ और ४ ) में आदरणीया श्रीमती उमाबाई आरूर  पाच्ची द्वारा बहुत ही सुन्दर  रूप में वर्णित किया गया है, हमारे पूज्य पूर्वज श्री महाबलेश्वर मंदिर गोकर्ण के पवित्र परिसर में खान पान का त्याग कर ध्यान में, तब तक हार न मानने का संकल्प ले कर  बैठे थे, जब तक ईश्वर उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं देते।  इस प्रकार सात दिन के अनुष्ठान के पश्चात् उन में से एक वरिष्ठ सज्जन को भगवान श्री भवानीशंकर का दृष्टांत हुआ। 

 

रथसप्तमी १७०८: गुरु-प्राप्ति-दिवस, कोटितीर्थ, गोकर्ण. चित्रकला - कु.मिताली यु. राव
 
 

 तब कृपालु ईश्वर ने घोषणा की  कि उत्तर भारत से एक संन्यासी अगले दिन संध्याकाल में कोटितीर्थ पहुँचेंगे।  साक्षात् ईश्वर के अवतार, वे तपस्वी सहर्ष चित्रापुर सारस्वतों का गुरुपद स्वीकारेंगे।  रथसप्तमी को ही उन पूजनीय संन्यासीजी (परम पूज्य श्रीमत् परिज्ञानाश्रम स्वामीजी - प्रथम) से हमारे पूर्वजों की वह अद्वितीय भेंट हुई थी।  इसीलिए यह गुरु-प्राप्ति-दिवस हमारे लिये अत्यधिक पवित्र है।

कैलेंडर में  हालांकि उत्तरायण, रथसप्तमी से पहले आता है, किन्तु अपने रथ को मोड़कर, सूर्य का दृढ़तापूर्वक उत्तर दिशा की ओर गमन, रथसप्तमी से ही माना जाता है।  वाकई, यह कितना आश्चर्यजनक पवित्र संयोग है कि हमारा गुरु-प्राप्ति-दिवस, रथसप्तमी को ही पड़ता है। वस्तुतः  वह हमारे प्रथम गुरु का आगमन ही था, जिसने हमारे समाज को उत्तरायण की दिशा दर्शाई, जिस दिशा में अपनी विलक्षण गुरु परंपरा के मार्गदर्शन के साथ भगवत्-प्राप्ति हेतु हमारे कदम अग्रसर हो सकते हैं।
 

।। ॐ नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव ।। 

गुरुवार हुआ गुरुमय....
 

 ( श्री कैलाश सारस्वत माम एवं डॉ राम सारस्वत माम द्वारा )
लगातार ११ सत्संग में मिला स्नेही स्वजनों का सान्निध्य ...

परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामी जी और गौरवशाली श्री चित्रापुर गुरु परंपरा के उच्च मापदंडों के अनुसार श्री चित्रापुर मठ के साधकों के मार्गदर्शन और संचालन से बीजेएस सारस्वत साधकों के साथ ५ अगस्त २०२१ से सत्संग का सिलसिला प्रारंभ हुआ जो लगातार ९ जनवरी २०२२ तक चला।  स्नेहमय परिचय के साथ-साथ चर्चा एवं भक्तिमय सत्संग संपन्न हुए। १५-२० साधकों का समागम बढ़ते बढ़ते ५०-५५ तक पहुँचा। 

 

 

इन एकादश सत्संगो में मुख्य बात यह रही कि हमारी उज्ज्वल श्री चित्रापुर गुरु परंपरा के एकादश गुरुओं का जीवन चरित्र क्रमशः  बहुत ही जीवंत तरीके से दर्शाया गया। प्रत्येक गुरु परिचय में उनके जीवन की चमत्कारिक घटनाओं और उनके समाज कल्याण के कार्यों को बखूबी दिखाया गया। गुरुदेवों के जीवन से संबंधित दिव्य घटनाओं को चित्रापुर समाज के भ्राता भगिनियों ने चित्रों और पॉवर पॉइंट प्रस्तुतियों से इतना मार्मिक बनाया कि प्रथम मठाधिपति परम पूज्य श्रीमत् परिज्ञानाश्रम (प्रथम) स्वामीजी से ले कर वर्तमान मठाधिपति परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी  तक के जीवन चरित्र की संपूर्ण यात्रा हमारे मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ गई, जिन घटनाओं से बीजेएस अनभिज्ञ था। सत्संगों के माध्यम से हमारी उज्ज्वल परंपरा के महान गुरुदेवों के दिव्य चरित्र को जान कर हम निहाल हो गए और मस्तक गर्व से ऊँचा हो गया कि हम इतनी पवित्र और महान परंपरा के अनुयायी हैं।

 हर सत्संग में वही ऊर्जा और गरिमामय वातावरण रहा। भजनों की मधुर सरिता बही, स्तोत्र पाठ हुए। सभा प्रारंभ प्रार्थना एवं समाप्ति प्रार्थना का प्रशिक्षण लेकर हर आयु-वर्ग के सदस्यों ने, उन्हें पूरी श्रद्धा भक्ति से प्रस्तुत किया। साधकों ने अपने विचार व्यक्त किए, लोक गीत गाए।  संस्कृति विषयक जानकारी का आदान-प्रदान हुआ। पूज्य गुरुदेव से मिले स्नेहिल सान्निध्य को अभिव्यक्त किया। परस्पर संवाद के माध्यम से साधकों ने गुरुवरों का स्मरण किया। बच्चों, युवक, युवतियों ने कर्णप्रिय भजनों के माध्यम से उपासना का वातावरण बनाया। बीजेएस साधकों ने सपरिवार इस आनंददायक और प्रेरणादायक सत्संग का लाभ लिया। 

 

 

सभी ११ सत्संग अत्यंत ही उच्चस्तरीय, गरिमामय तथा भक्तिमय संपन्न हुए। इन सत्संग के दौरान यदि यह कहा जाए कि उत्तर और दक्षिण भारत के साधकों का आध्यात्मिक व पारिवारिक मिलन हुआ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बीजेएस साधकों ने परंपरागत निज भाषा और अपनी शैली में भजनों को प्रस्तुत किया। साथ ही परंपरागत तीज त्यौहारों का विवरण चित्रों के साथ प्रस्तुत कर  सहभागी हुए। दक्षिण भारत के साधकों ने अपनी मधुर वाणी तथा आदर पूर्वक प्रत्येक वाक्य के साथ गुरु परंपरा के उच्च आदर्शों को प्रस्तुत कर मन मोह लिया।

 पूज्य श्री की बीकानेर और जोधपुर यात्रा तथा बीजेएस साधकों की शिराली यात्रा से बहुत से परिवारों में पवित्र परंपरा तथा पूज्य श्री का परिचय पहुँचा था। और इन ११ सत्संग श्रृंखला से यह पावन कार्य और अधिक विस्तारित हुआ। सत्संग के माध्यम से गुरु परम्परा जोधपुर, बीकानेर, दिल्ली सहित देश के अनेक घरों तक पहुँची। 

 

 

इस तरह परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी के आशीर्वाद से प्रारंभ हुई एकादश सत्संग श्रृंखला - प्रथम आवर्तन का भव्य समापन ९ जनवरी २०२२ को ११ वें सत्संग के द्वारा हुआ। 

आभार
बीजेएस के तरुण, तरुणियों तथा बालकों द्वारा स्पष्ट रूप से स्तोत्र पठन, भजन, प्रार्थना करवाने में  सत्संग कोर टीम की खूब भागीदारी है। यह उन साधकों की कठिन तथा लगातार मेहनत का ही परिणाम है कि हमारी युवा पीढ़ी ने गुरु परंपरा को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना लिया। यह हम सभी पर पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद को दर्शाता है। सुषुप्त समाज को आध्यात्मिक रूप से जगाने में आप सभी के माध्यम से हम पर जो गुरु अनुकंपा हुई इसके लिए हम आपके ऋणी हैं। 

वेबसाइट से संबंधित जानकारी तथा कार्यक्रम के सफल संचालन में वेबसाईट टीम का सहयोग हमारे लिए अविस्मरणीय है। 
माननीय सचिवालय का सतत संपर्क हेतु कोटिशः आभार। 

स्टेंडिंग कमिटी प्रेसिडेंट प्रवीण पी कडले माम के उचित मार्गदर्शन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।

टीम सायुज्यं व मेलनम् के सभी साधकों का बहुत बहुत आभार। 

सभी सत्संगों तथा अन्य सायुज्यं गतिविधियों को संपादित करने में बीजेएस साधक डॉ. राम सारस्वत ने हमारे और श्री चित्रापुर मठ परंपरा के मध्य एक सेतु समान सामंजस्य स्थापित कर महत्त्वपूर्ण  भूमिका निभाई।

यह सत्संग निरंतर अनवरत जारी रहे,  परम पूज्य स्वामी जी के आशीर्वाद से हम और नये सोपान गढ़ें, ऐसी आशा है।

व्यक्तिगत कार्य में भी गलती होना स्वाभाविक है, फिर यह तो समाज का ईश्वरीय कार्य था, तो इधर से कोई उदासीनता या गलती हुई हो, तो क्षमा करें।
सत्संग से सभी साधकों को अमूल्य लाभ मिला है। हमारे कुछ साधकों ने सत्संग के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं, जो निम्नलिखित हैं..
"मैं विज्ञान का छात्र होने के बावजूद भी श्री परिज्ञानाश्रम त्रयोदशी का सहजता से पाठ कर पाया, ये पूज्य स्वामी जी व पवित्र गुरु परंपरा का ही आशीर्वाद है।" 
- डॉ. दिवाकर सारस्वत (खाजूवाला)

"इन पावन सत्संगों में भागीदारी के पश्चात् मेरा रूझान अध्यात्म व पवित्र परंपरा के प्रति और मजबूत हुआ। परस्पर वार्तालाप, समन्वय और संबंधों को मजबूती मिली।" 
- हिमांशी सारस्वत (फतेहाबाद हरियाणा)

"इन पावन सत्संगों के माध्यम से पवित्र परंपरा के बारे में नजदीक से जानने का अवसर मिला। परस्पर संवाद और मेल मिलाप से संबधों में प्रगाढ़ता बढ़ी, पूजनीय परंपरा के प्रचार प्रसार में “सत्संग” मील का पत्थर साबित हुआ।"
  - गिरीश सारस्वत (गाजियाबाद)

"हालांकि मैं पूजनीय परंपरा से विगत कई वर्षों से जुड़ी हूँ, पूज्य स्वामी जी का दीक्षा आशीर्वाद मिला है। शिराली यात्रा का भी सौभाग्य प्राप्त है, परंतु सही मायनों में सत्संगों ने परिचय करवाया और समर्पण भाव में वृद्धि की।"
-प्रेम पाच्ची सारस्वत (भीलवाड़ा )

"मैंने एक-दो सत्संगों में ही मम्मी के साथ भाग लिया तथा "दारिद्रय दुःख दहन" स्तोत्र सीखा तथा गाया। सत्संग में भाग लेने के बाद मुझ में संस्कृत भाषा सीखने की ललक हुई। मैंने तीन चार श्लोकों को कंठस्थ भी किया है। समय-समय पर मैं इन्हें गाता भी हूँ। इसके लिए मैं सभी को धन्यवाद देता हूँ।"
- रजत सारस्वत (जोधपुर)

पिछले साल में गुरु कृपा से जितने सत्संगों में मैंने हिस्सा लिया उनमें मुझे हर बार गुरुदेव जी को समझने व उनका आशीर्वाद पाने का बहुत मौका मिला है, इसलिए सत्संग चाहे ओनलाइन हो या ओपन हो, सत्संग का महत्व गुरु आशीर्वाद जैसा ही होता है।"
- प्रेम प्रकाश सारस्वत (खारडा) 

"बहुत ही आध्यात्मिक और सारगर्भित सत्संग रहे। बहुत कुछ जानने और सीखने को मिला। सभी के प्रति अपनत्व का अहसास हुआ। गुरुदेव का आशीर्वाद और स्नेह हम सब पर यूँ ही बना रहे।"
-हुकुम चंद सारस्वत (बीकानेर )

"मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ, वो शब्दों में पिरोना असंभव है। केवल तीन चार सत्संग से आत्म विश्वास व शान्ति का अनुभव और आभास हुआ। मैं जानता हूँ, कीमती समय निकाला जा रहा है, पर यह भी परम सौभाग्य है जो मुझे सत्संग में आप सभी का सान्निध्य, आशीर्वाद व आनंद प्राप्त हुआ।"
-हजारी प्रसाद सारस्वत (खाजूवाला)

"सत्संग के दौरान शिराली के साधकों से मुलाकात मेरे लिए अत्यंत ही आनंददायक और उपयोगी रही, पूज्य स्वामी जी के जोधपुर प्रवास के दौरान आप सभी से मुलाकात हुई थी, उसके बाद सत्संग में मुलाकात अत्यंत प्रसन्नतादायक रही। बीकानेर तथा अन्य स्थानों के साधकों से विचार विमर्श और सत्संग का आदान-प्रदान मेरे लिए सौभाग्य शाली रहा। गुरुदेव का आशीर्वाद हम सभी पर बना रहे। 
-मनीषा सारस्वत (जोधपुर)

"सत्संग की श्रृंखला से गुरु परंपरा को समीप से जानने का अवसर मिला, साथ ही चित्रापुर सारस्वत समाज व उतर भारत सारस्वत समाज को आपस में जानने व समझने का अत्युत्तम मंच मिला, मठ परंपरा की रीति नीति को बारीकी से जाना व समझा। छोटे छोटे बच्चो में पठन पाठन का अभ्यास देखते ही बन रहा है।"
-पवन सारस्वत (खाजूवाला)

"सत्संग के माध्यम से सबसे मिलने का मौका मिला एवं बहुत कुछ सीखने को मिला जिसके बारे में अब तक अनभिज्ञ था।"
-श्री किशन सारस्वत (चूरू)

"सत्संग के दौरान आदरणीया पाच्चियों तथा अन्य ज्येष्ठ साधकों का मार्गदर्शन और आशीर्वाद मुझे मिला। आपके आशीर्वाद से मैं गुरु चरणों में कुछ भजन व स्तोत्र समर्पित कर पाई। मेरे लिए यह गौरवशाली रहा। परम पूज्य गुरुदेव तथा आप सभी का आशीर्वाद ऐसे ही बना रहे। "
-  यु. गरिमा सारस्वत (जोधपुर)

“कोरोना काल में सब लोग परम पूज्य स्वामीजी के दर्शन तो नहीं कर सकते थे, न ही हम सब आपस में मिल सकते थे। तब चित्रापुर साधक भाई बहनों ने ऑनलाइन सत्संग के माध्यम से हम सभी को जोड़ा। शुरुआत में लगा हम क्या करेंगे , क्या बोल पायेंगे, पर मठ के साधकों ने हमें बहुत कुछ सिखाया।  प्रार्थना, स्तोत्र, भजन व्यक्तिगत फोन करके प्रैक्टिस करवाई। हमारे बच्चों को भी सिखाया। बच्चे भी सहभागी होने लगे। सब कुछ बहुत अद्भुत था। कोरोना समाप्त होने के पश्चात् भी मैं चाहती हूँ कि सत्संग के माध्यम से हम जुड़ें रहें। 
- श्रीमती मंजु सारस्वत  (सूरत )


।। ॐ नमः  पार्वती पतये हर हर महादेव।। 

 

संकलन  - नंदिता माधव पाच्ची 
विशेष सहकार्य - उदया माविनकुर्वे पाच्ची एवं केशव सोराब माम 

  ”हमें उत्सव शब्द के अर्थ और उत्सव मनाने के उद्देश्यों को भलीभाँति, बुद्धिमत्तापूर्वक समझकर उसमें भाग लेना चाहिए और इस समझदारी को केवल अपने परिवार, समाज या देश तक सीमित न रखते हुए, पूरे विश्व के साथ साझा करना चाहिए।”
-परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी, श्री चित्रापुर मठ, शिराली के एकादश मठाधिपति  

 ”त्यौहार” के लिए प्रयोग किए जाने वाले  संस्कृत शब्द “उत्सव” की उत्पत्ति “उत्” शब्द से होती है जिसका अर्थ होता है - उत्थान। हमारे प्राचीन ऋषियों ने प्रत्येक उत्सव को मनाने का परंपरागत, उचित विधि विधान हमें दिया है, जिससे हमारा उत्थान हो और हम प्रकृति के माध्यम से दिव्यता के निकट आयें। हमारे त्यौहार उल्लेखनीय हैं, क्योंकि इन त्यौहारों में गृहस्थों द्वारा की जाने वाली सहज, सरल पूजा अथवा विस्तृत, पारंपरिक वैदिक पूजा तथा उत्सव से संबंधित अन्य मनोरंजक कार्यक्रम हमारे भीतर के साधक एवं  शिशु, इन दोनों को आकर्षित करते हैं। प्रत्येक त्यौहार ईश्वर के साथ और अधिक निकटता से जुड़ने का एक विशेष अवसर है।
 
 हमारा प्रत्येक प्रमुख उत्सव ऋतुओं के सुंदर एवं क्रमशः परिवर्तन से संबंधित है। हमारी समृद्ध संस्कृति इस गहन  विश्वास पर आधारित है कि प्रकृति और बदलती हुई ऋतुएँ, ईश्वर की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। यही विश्वास हमें कला, नृत्य और संगीत के माध्यम से अपनी भक्ति व्यक्त करने का अवसर भी देता है क्योंकि कला को दिव्यता की ही अभिव्यक्ति माना जाता है, जो ईश्वर के साथ हमारे संबंधों को और सुदृढ़ करती है । इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है - "होली"। 
 
होली एक अत्यंत लोकप्रिय उत्सव है, जो मौज और मस्ती के साथ मनाया जाता है, परंतु इसमें निहित एक गूढ़ अर्थ  भी है। हिंदू पंचांग के अंतिम मास अर्थात् फाल्गुन की पूर्णिमा को यह त्यौहार मनाया जाता है, जो अधिकतर मार्च के मध्य में पड़ता है। वैदिक काल से यह त्यौहार मनाया जा रहा है, जिसका संकेत हमें अथर्ववेद के 'परिशिष्ट' में  मिलता है : "अब, होलाका पर्व, फाल्गुन महीने की पूर्णिमा की रात को है।"  

'होली' शब्द संस्कृत  “होलाका” से व्युत्पन्न  है, जो संस्कृत मूल “हू” से  प्राप्त होता है और जिसका अर्थ है “बलिदान अथवा न्यौछावर करना”।  इसलिए सार्वभौमिक मान्यता यह है कि होली हमारे लिए अपनी नकारात्मकताओं को अग्नि में न्यौछावर कर स्वयं के शुद्धीकरण का समय है। वैदिक काल में, उस दिन “नवात्रैष्टि  यज्ञ” किया जाता था। पुराणों और इतिहास में भी होली के बारे में अनेक कथाएँ  हैं । भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उस क्षेत्र में प्रचलित कथाओं के आधार पर प्रथाएँ भी भिन्न भिन्न होती हैं।

होली से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथा, भगवान विष्णु के बाल भक्त, प्रह्लाद की है। प्रह्लाद के पिता, असुरों के राजा हिरण्यकश्यप ने, भगवान विष्णु के प्रति अपने पुत्र की भक्ति से क्रोधित होकर, अपनी राक्षसी बहन,  होलिका को प्रह्लाद की हत्या का आदेश दिया। होलिका को एक वरदान प्राप्त था, जिसके कारण अग्नि कभी भी उसे दहन नहीं कर सकती थी । अतः लकड़ी की एक विशाल चिता बनाई गई, और होलिका नन्हें भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर उस चिता पर बैठ गई। भगवान विष्णु की कृपा से भक्त प्रह्लाद पूरी तरह से बच गए, परंतु दुष्ट होलिका जलकर राख हो गई। यह पौराणिक कथा,  “होलिका दहन” का आधार है, जो हर प्रांत में  होली के उत्सव का एक सामान्य अंग है, जो बुराई के विनाश का द्योतक है, और जो हर बार बुराई पर अच्छाई की आत्यंतिक विजय की पुनरावृत्ति करता है।  

भारत के ब्रज प्रदेश में, जहाँ श्री कृष्ण और राधाजी पले बढ़े, यह त्यौहार उनके परस्पर दिव्य प्रेम के प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है और यह पूर्णिमा के पाँचवे  दिन, रंग पंचमी तक चलता रहता है। एक लोकप्रिय दंतकथा के अनुसार, श्री कृष्णजी अपने कृष्ण वर्ण के कारण उदास थे और वे हमेशा यह सोचकर हताश हो जाते थे कि वे गौरवर्णीया राधाजी के प्रेम को जीतने में असफल रहेंगे। यशोदा मैय्या ने सुझाव दिया कि वे राधाजी  के पास जाएँ और उनसे अपनी पसंद के किसी भी रंग से उनका चेहरा रंगने के लिए कहें। राधा ने प्रेम से कृष्णजी के चेहरे को रंग बिरंगे रंगों से रंग दिया और तब से यह दिन, रंगों की बौछार में 'होली' के नाम से मनाया जाने लगा ।


'वाल्मीकि रामायण' की एक अन्य कथा के अनुसार, इस तिथि और नक्षत्र पर देवी सीता और भगवान राम विवाह के पवित्र बंधन में बंधे थे। इसीलिए, यह समय सगाई और विवाह के लिए योग्य और शुभ माना जाता है। दिव्य प्रेम का प्रतीक यह समय वह सुअवसर भी है, जब सभी मंदिरों में देवी पार्वती और भगवान परमेश्वर, मुरुगन और देवयानै, तथा कोदै आण्डाल और रंगमन्नार जैसी दिव्य जोड़ियों के विवाह का उत्सव मनाया जाता है। ब्रह्मानंद पुराण में मुद्रित है कि इस “पंगुनी उथिरम” पर सभी स्थानों का पवित्र जल तिरुपति तिरुमाला के सात पवित्र सरोवरों में एकत्रित हो जाता है।

होली को, “योशांग जाजिरी”, “धुलैण्डि”, “फगुवा”, “शिग्मो”, “उक्कुळी ” और “कामन हब्बा” जैसे कई नामों से भी जाना जाता है। आम तौर पर यह त्यौहार दो दिन तक मनाया जाता है। होली  से पहले की रात्रि में, फाल्गुन पूर्णिमा की शाम को होलिका दहन से इस त्यौहार की शुरुआत होती है। लोग एक सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित  होते हैं, जहाँ लकड़ियों का ढेर तैयार किया गया है। एक लघु पूजा के पश्चात् उपस्थित जनसमुदाय प्रार्थना करता है  कि राक्षसी  होलिका की तरह उनके भीतर की सभी बुराइयाँ भी नष्ट हो जाएँ , तत्पश्चात् लकड़ी के ढेर में अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है।

हमारी संस्कृति की  तेजोमय व्यापक सुन्दरता को प्रतिबिंबित करने वाला यह होली का पर्व इस समस्त उपमहाद्वीप में मनाया जाता है। आश्चर्यजनक सत्य यह है कि किस तरह देश के प्रत्येक क्षेत्र में होली भिन्न भिन्न रूप से मनायी जाती है।
 
उत्तर भारत में होली, बसंत की पराकाष्ठा का प्रतीक है और शुष्क, ठंडी शिशिर ऋतु के बाद स्फूर्तिपूर्ण, स्नेहिल बसंत ऋतु के आगमन का स्वागत करने वाले इस त्यौहार को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यहाँ होली का त्यौहार बसंत की उत्कृष्ट फसल के लिए देवताओं से प्रार्थना करने और परिवार तथा मित्र मंडली के साथ खुशी के कुछ पल साझा करने का समय है। इस अवसर पर हर प्रांत में  विशिष्ट मनभावन लोकगीत और भक्तिपूर्ण  भजन  प्रहरानुसार  गाए जाते हैं क्योंकि अधिकतर वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पर आधारित होते हैं।

पंजाब और हरियाणा में होली का उत्सव भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा पर आधारित है, जो प्राचीन सिक्ख समाज  में लोकप्रिय था। गुरु ग्रंथ साहिब में इस कथा का वर्णन करने वाले छंद भी हैं। सिक्खों में उनके अंतिम दशम गुरु, श्रीयुत् गुरु गोबिंद सिंहजी द्वारा आरंभ किया गया “होला मोहल्ला” नामक एक अन्य त्यौहार भी  है। 'होला मोहल्ला' एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है, जिसमें सिक्ख समाज के सदस्य कृत्रिम युद्धों के माध्यम से युद्धाभ्यास की विभिन्न युक्तियों  का प्रदर्शन करते हैं।

 भारत के पूर्वी क्षेत्र में होली के उत्सव का रुझान शास्त्रीय कलाओं के प्रदर्शन की ओर अधिक है। इन राज्यों में होली को “बसंत उत्सव”, "डोल पूर्णिमा" या "डोल जत्रा” के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि मंदिरों के गर्भ गृहों से देवताओं की मूर्तियों को भव्य शोभा यात्रा करते हुए आसपास के क्षेत्रों में ले जाया जाता है। ओडिसा में “डोला होली” उत्सव फाल्गुन दशमी से शुरू होकर पाँच से सात दिनों तक चलता है, जब भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों को सुंदर, अलंकृत पालकियों में बिठाकर, पूजा, भोग और रंगीन अबीर अर्पित कर यात्रा करवाई जाती है।  
 
मणिपुर में, होली को “योशांग या याओसांग” कहा जाता है, जो इस घाटी का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। बसंत ऋतु का यह पाँच दिवसीय त्यौहार, विशेष रूप से मैतेई लोगों द्वारा मनाया जाता है, जिसका मुख्य आकर्षण, होली त्यौहार  का एक पारंपरिक लोक नृत्य , “थबल चोंगबा” (चांदनी रात में नृत्य) है।  


महाराष्ट्र में, होली को “शिग्मा” या “रंग पंचमी” के नाम से भी जाना जाता है। होलिका दहन के बाद गायन, नृत्य और एक दूसरे पर रंग डालना, ये इस  द्वि-दिवसीय उत्सव की जनसामान्य प्रणालियाँ हैं। परंतु सबका मनपसंद विशेष व्यंजन 'पूरनपोली', इस त्योहार की मधुरता को बढाता है। होली के साथ इस व्यंजन की घनिष्ठता इतनी है कि इस दिन का एक सर्वप्रिय लोकगीत है “ होळी रे होळी, पूरणाची पोळी”!  पूजा के बाद परिवार के देवताओं को नैवेद्य के रूप में पूरन पोली और अन्य स्वादिष्ट व्यंजन बड़े प्रेम और श्रद्धा से अर्पित किए जाते हैं।
 
आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में होली को “जाजिरि, कामुनि पुन्नमी या काम पूर्णिमा” कहा जाता है। यह कामदेव और रतिदेवी की कथा से संबंधित है, इसलिए इसे “कामविलास, कामुनि पण्डुग और कामदहनम्” भी कहा जाता है। भक्त, गाँव के रति-मन्मथ मंदिर में जाकर देवताओं को पूजा एवं रेशमी वस्त्र अर्पण करते हैं। 

कर्नाटक में होली को “काम दहन” के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर सिरसी गाँव का उत्सव विशेष रूप से  उल्लेखनीय है। होली पूर्णिमा से पहले पाँच दिनों तक रात्रि के समय "बेदार वेशा" (आखेट - नृत्य) नामक एक अनूठा लोक नृत्य प्रस्तुत किया जाता है, जो भारत के विभिन्न प्रांतों से बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है। किंतु  यह विशेष कार्यक्रम केवल हर दूसरे वर्ष में ही आयोजित किया जाता है।
 
श्री चित्रापुर मठ में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन, पारंपरिक होलिका दहन के साथ यह उत्सव मनाया जाता है। प्रायः मठ में  सायंकाल की “अष्टावधान पूजा” के पश्चात् यह उत्सव मनाते हैं। लोग “रथागाद्दे” ( जिस मैदान में रथोत्सव मनाया जाता है) के सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित होते हैं, जहाँ सूखी लकड़ियों का ढेर स्थापित किया जाता है। बीच में एक बांस खड़ा कर सभी सूखी लकड़ियों और नारियल के वृक्ष की सूखी शाखाओं को उससे बाँधा जाता है। यह इसे कुछ कुछ शंकु का आकार देता है।

अर्चक होलिका की इस चिता को हल्दी और कुमकुम से लेपित नारियल अर्पण कर, आरती करते हैं। आरती करने के बाद होलिका की चिता में अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है और साधक अपने भीतर की बुराइयों और नकारात्मक गुणों के विनाश के लिए प्रार्थना करते हैं। होलिका दहन की यह जनमान्य प्रथा भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों में मनाए जाने वाले इस त्यौहार के विभिन्न रीति रिवाजों को एक सूत्र से बाँधती है।

 परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी के एक अन्य दिव्य उद्गार के साथ हम इस लेख का समापन करते हैं :

"आइये, हम गर्व के साथ इसमें सहभागी हों - इस स्वाभिमान के साथ कि हमें एक ऐसी संस्कृति में जन्म मिला है, जो  हमें सामूहिक रूप से ईश्वर की दिव्य मोहक अभिव्यक्तियों के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित और साझा करने के निराले और कलात्मक अवसर प्रदान करती है।"
 

(आंग्ल संकलन  –  श्रीमती कुशल तलगेरी बैलूर, श्री हल्दीपुर नागेश भट माम)
( हिंदी संस्करण - टीम अनुवाद) 

 

'युगादि' , जिसका अर्थ है - 'एक नए युग की शुरुआत',
'युगादि' - गत वर्ष का सिंहावलोकन करने और नए वर्ष में शक्ति वर्धन के नूतन अवसरों का स्वागत करने का शुभ समय। 

हिंदुओं के लिए यह शुभ दिवस एक नए पंचांग वर्ष के प्रारंभ का प्रतीक है।
यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को पड़ता है और कई कारणों से एक विशेष और महत्वपूर्ण त्यौहार है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन :

  • ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी ।
  • भगवान श्रीरामचंद्रजी का राज्याभिषेक हुआ था ।
  • चैत्र मास के पहले दिन (पड़वा), सूर्य वसंत प्रतिच्छेद (भूमध्य रेखा और मेरिडियन के कटाव बिंदु) पर स्थिति ग्रहण करता है और नए पत्तों एवं चारों ओर खिलते हुए रंग बिरंगे पुष्पों के साथ वसंत ऋतु का आगमन होता है ।
  • कृषि - क्षेत्रों  में इस दिन खेतों की जुताई की जाती है, जो रबी की समाप्ति का और नई फसलों की बुवाई की शुरुआत का प्रतीक है।

 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हमारे देश में अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है और विभिन्न नामों से जानी जाती है।

 युगादि या संवत्सरादि: कर्नाटक,आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के दक्षिणी राज्य में लोग अपने घरों के सामने रंगोली बनाकर नए वर्ष का स्वागत करते हैं और मुख्य द्वार को तोरण (आम के पत्तों की माला) से सजाते हैं। लोग नए कपड़े पहनते हैं और ‘होलीगे ‘(पूरनपोली) के साथ मेजवानी करते हैं। पचड़ी - एक विशेष प्रकार का व्यंजन, जो इमली (खट्टा), नीम के फूल (कड़वा), गुड़ (मीठा), नमक (नमकीन ), हरी मिर्च (तीखा) और कच्चा आम (कसैला), इन सभी सामग्रियों को मिलाकर बनाया जाता है। यह आगामी वर्ष में हमारे समक्ष आने वाले विभिन्न आनंददायक एवं जटिल अनुभवों की स्वीकृति का एक प्रतीकात्मक अनुस्मारक है।

गुड़ी  पाड़वा - महाराष्ट्र में, हिंदू नव वर्ष 'गुड़ी पाड़वा' के रूप में मनाया जाता है। दिन की शुरुआत तेल मालिश एवं अभ्यंग स्नान के साथ होती है। घर के द्वार को तोरण (आम के पत्तों और लाल फूलों की माला) से सजाया जाता है। ‘गुड़ी’ को निम्नलिखित तरीके से स्थापित किया जाता है :
एक चमकीले हरे या पीले रंग का जरी वस्त्र एक लंबे बाँस की नोक से बाँधा जाता है, जिसके ऊपर गाठी (मिश्री की माला), नीम के पत्ते, आम और नीम के पत्तों की एक-एक टहनी और लाल फूलों की माला इत्यादि बाँधे जाते हैं। इसके बाद चांदी या तांबे के बर्तन को लंबे बाँस के ऊपर उल्टी स्थिति में रखकर गुड़ी फहराई जाती है। इसके सामने भूमि पर रंगोली बनाई जाती है। इस गुड़ी की पूजा सूर्योदय के समय की जाती है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सूर्य किरणों की अग्नियुक्त रचनात्मक शक्ति उस समय अपनी चरम सीमा पर होती है। भगवान ब्रह्मा और विष्णु से अपनी साधना को तीव्र करने और इस ऊर्जा का उचित विनियोग करने के लिए आशीर्वाद माँगा  जाता है। यह नूतन परिधान धारण करने एवं पारिवारिक समारोहों का उत्सव है। मीठे और कड़वे दोनों तरह के अनुभवों को समभाव से स्वीकार करने की याद दिलाने के लिए गुड़ और नीम के पत्तों के मिश्रण का सेवन किया जाता है। दोपहर के शानदार भोजन में श्रीखंड और पूरी एवं पूरनपोली जैसे इस उत्सव के विशेष व्यंजन शामिल होते हैं। पंचांग का पठन प्रायः शाम को किया जाता है।

चेटी चंड  - सिंधी समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला यह त्यौहार वसंत और नई फसल के आगमन का प्रतीक है। यह उडेरोलालजी के जन्म का भी प्रतीक है, जिसे संत झूलेलाल के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन, सिंधी समाज के कई लोग बहराणा साहिब (झूलेलाल के प्रतिनिधिस्वरूप) को निकट की नदी या झील में ले जाते हैं। बहराणा साहिब में एक तेल का दीपक, मिश्री, इलायची और फल होते हैं। इनके साथ एक कलश और एक नारियल रखा जाता है, जिसे कपड़े, फूल और पत्तियों से ढाँका जाता है। सिंधी समुदाय संत झूलेलाल और अन्य हिंदू देवताओं की झांकियों के साथ मेलों, दावतों, जुलूसों के साथ यह त्यौहार मनाता है। व्यंजनों में तहिरी (मीठे चावल) और साई भाजी (किंचित मात्रा में चना दाल एवं पालक की भाजी) सम्मिलित होती हैं।

 
श्री चित्रापुर मठ, शिराली में युगादि उत्सव
प्रातःकाल की सेवा के नियमित दैनिक अनुष्ठानों के पश्चात् युगादि के उपलक्ष्य में भगवान भवानीशंकर महादेव को एक विशेष सेवा - रुद्राभिषेक सेवा - नए पंचांग के साथ अर्पण की जाती है। यह बैग्गोन पंचांग हर वर्ष गोकर्ण से प्राप्त किया जाता है - एक परंपरा जिसका पालन परम पूज्य श्रीमद् आनंदाश्रम स्वामीजी की कालावधि से निरंतर किया जा रहा है।
शाम को, मठ में सभी साधकों और स्थानीय निवासियों की उपस्थिति में श्री उल्मन दिनेश भट माम द्वारा पंचांग वाचन कन्नड़ भाषा में किया जाता है। इस पंचांग वाचन में लगभग एक घंटे का समय लगता है क्योंकि इसमें सभी ऋतुओं के पूर्वानुमान से लेकर आगामी वर्ष में प्रत्येक राशि के लिए अपेक्षित विभिन्न विषयों पर जनजीवन से संबंधित सामान्य वार्षिक भविष्यवाणियाँ सम्मिलित होती हैं।
पंचांग वाचन के पश्चात् श्री चित्रापुर मठ दिनदर्शिका का, वर्तमान मठाधिपति, परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी के दिव्य हस्तों द्वारा आशीर्वाद सहित विमोचन किया जाता है। दिनदर्शिका का प्रथम अर्पण भगवान भवानीशंकर महादेव और गुरुपरंपरा को किया जाता है। अर्पण करने के पश्चात्, उसी शाम इस दिनदर्शिका की प्रतियाँ श्री चित्रापुर मठ की अन्य सभी शाखाओं और स्थानीय सभाओं को वंतिगा दाताओं में वितरण के लिए भेजी जाती हैं।
अष्टावधान पूजा के पश्चात् ताजे मौसमी फलों से बना पानक पनवार का प्रसाद भोजनशाला में एकत्रित सभी साधकों में वितरित किया जाता है।
(स्रोत: अंतर्जाल - संसाधन, उत्सव पुस्तक और श्री चित्रापुर मठ, शिराली के श्री हल्दीपुर नागेश भट माम के विशेष सहयोग द्वारा )

लेख-लेखन  – डॉ. सुधा तिनैकर पाच्ची 
     हिंदी संस्करण : टीम अनुवाद  

समस्त विश्व में ऐसे महात्माओं के जन्मोत्सव मनाए जाते हैं, जिन्होंने मानवता के उत्कर्ष में योगदान दिया है। सनातन धर्मियों के लिए आदि शंकराचार्य जी का जन्म तत्कालीन  प्रचलित आध्यात्मिक दर्शनों के प्रति एक समग्र नवीन दृष्टिकोण का द्योतक सिद्ध हुआ है। हालाँकि आदि शंकराचार्यजी के वास्तविक जन्मकाल के विषय में विद्वानों के विभिन्न मत हैं, प्रायः यह मत सर्वमान्य है कि उनका जन्म वैशाख मास की शुक्ल पंचमी को हुआ था। आज भी यह शुभ दिवस अद्वैत दर्शन के सर्वोच्च गुरु को कृतज्ञता पूर्वक नमन करते हुए मनाया जाता है।
 
यद्यपि औपनिषदिक-शिक्षा अद्वैत- सिद्धांत पर आधारित है, आदि शंकराचार्यजी  के जन्म की कालावधि में वेदों के तात्पर्य का पूर्णतः खंडन हो रहा था। वेद-पूर्व अर्थात् पूर्व-मीमांसा दर्शन प्रचलित हो रहा था और समाज का ध्यान अधिकांश रूप से धार्मिक विधि विधानों की ओर ही निर्देशित किया जा रहा था। वेदों का मूलभूत तात्पर्य पूरी तरह से भुला दिया गया था।

ऐसी परिस्थिति में शंकर का जन्म केरल क्षेत्र में पूर्णा नदी के तट पर बसे ‘कालडी‘ नामक छोटे से गाँव के एक साधारण हिंदु परिवार में हुआ। ऐसी मान्यता है कि शंकर स्वयं भगवान  शिव के ही अवतार थे ।हम सभी उस घटना से अवगत हैं कि किस प्रकार शंकर ने संन्यास  लेने  हेतु अपनी विधवा माता से अनुमति प्राप्त की थी ।
 
संन्यासाश्रम में प्रवेश करने पर उन्हें अपने गुरु गोविन्दपादजी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। केवल बत्तीस वर्षों के अल्प जीवनकाल में ही आदि शंकराचार्यजी जगदाचार्य बन गए। सनातन धर्म के प्रति उनका योगदान अगणित, अद्वितीय है ।

१. उनके जीवन काल में लगभग बहत्तर (७२ ) दार्शनिक मत प्रचलित थे। उन्होंने उन सभी को छह प्रमुख दर्शन-प्रणालियों में संकलित किया, जिससे समाज को बड़ी राहत मिली।
२. उन्होंने यह सिद्ध किया कि पूर्व-मीमांसा वेदों का परम लक्ष्य नहीं है। उन्होंने वेदांत के तात्पर्य का स्पष्ट रूप से विवेचन किया, जो केवल एक अद्वितीय शुद्ध चैतन्य को संपूर्ण सृष्टि के परम सत्य के रूप में प्रतिपादित करता है।अद्वैत को उस मूलभूत सिद्धांत के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया, जो प्रत्येक जीव को संसार से सदा के लिए मुक्ति की संभावना प्रदान करता है। उन्होंने प्रतिपादित किया कि “मोक्ष” केवल एक संभावना ही नहीं, अपितु यही परम सत्य है ।
३. उपनिषदों की यथार्थ शिक्षा को प्रतिष्ठित करने के लिए उन्होंने प्रस्थान-त्रय पर टिप्पणियाँ अर्थात् भाष्य का लेखन किया, जिसके कारण आज हम किसी भी भ्रांति के बिना वेदांत के  मूलभूत सिद्धांत को समझने में सफल होते हैं। 
४. उस कालावधि में श्रीयुत् बादरायण (व्यासाचार्य जी) द्वारा लिखित ‘ब्रह्मसूत्र’ की बड़ी  दोषपूर्ण व्याख्या की जा रही थी। शंकराचार्यजी ने ब्रह्मसूत्र पर अनुकरणीय भाष्य की रचना कर व्यासाचार्यजी  की कृति को उसके उचित रूप में पुनः प्रतिष्ठित किया।
५. अद्वैत का अध्ययन करने में असमर्थ साधकों के लिए उपासना हेतु उन्होंने कई स्तोत्रों की रचना की।
६. तत्कालीन भारतवर्ष की चार दिशाओं में चार विद्यार्जन केंद्र अर्थात् मठ स्थापित किए गए और उनके चार शिष्यों को वेदांत के संदेश का प्रचार-प्रसार करने का कार्य सौंपा गया।
७. आदि शंकराचार्य जी ने वेदों द्वारा उद्घाटित अद्वैत की शिक्षा हेतु उचित गुरु-शिष्य-परंपरा प्रणाली की स्थापना की।
८. बत्तीस वर्ष की आयु तक वे अखिल देश का परिभ्रमण कर अद्वैत को वेदों के एकमात्र सिद्धांत के रूप में स्थापित कर चुके थे। 
९. वे काश्मीर में सर्वज्ञ-पीठ पर आरूढ़ हुए, जो उस कालावधि के सर्वोत्कृष्ट दार्शनिकों के लिए ही स्थापित किया गया था।

यदि वेदों का यथार्थ संदेश आज भी सुरक्षित है, तो यह केवल आदि शंकराचार्यजी के मात्र बत्तीस वर्षों के अल्प जीवनकाल में किए गए योगदानों के कारण ही संभव हो सका है। उनकी कृतियाँ आज भी अपने विशुद्ध रूप में हमारे लिए उपलब्ध हैं, अतः उनके द्वारा रचित भाष्य सर्वोच्च प्रमाण माने जाते हैं। भविष्य में अनंत काल तक वैशाख शुक्ल पंचमी इस महान गुरु के प्रति कृतज्ञता अर्पित करने हेतु साधकों द्वारा मनाई जाती रहेगी ।

श्री चित्रापुर मठ , शिराली में सन २००८ में भगवान शंकराचार्य की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गयी। तब से लेकर हर शंकर-जयंती को ‘भाष्य पठन’ एवं ‘तोटकाष्टकम्’ स्तोत्र पठन के साथ ‘श्रीशंकराचार्य-पूजन’ किया जाता है। पूज्य स्वामीजी उस समय जहाँ कहीं भी होते हैं, वे स्वयं ही यह पूजन करते हैं।
 
श्री चित्रापुर मठ, बेंगलूरु में यह उत्सव बड़े उत्साह से मनाया जाता है ।आयु के अनुसार निर्धारित विभिन्न समूहों के लिए – आदि शंकराचार्यजी की जीवनी और संदेशों में से किसी विशेष पहलू पर लेखन-स्पर्धा ; आचार्य द्वारा रचित स्तोत्रों का पाठ ; इन महान आचार्य की जीवनी के विभिन्न पहलुओं पर आधारित रंगबिरंगी चित्रकारी-स्पर्धा, इत्यादि कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। इन स्पर्धाओं के विजेताओं के लिए पुरस्कार-वितरण का समारोह शंकर-जयंती को होता है। शंकर-जयंती के ही शुभ दिन पर सायंकालीन दीपनमस्कार के पश्चात् लगभग पंद्रह मिनट तक प्रस्थान-त्रय से कुछ चुने हुए अंशों का भाष्य पठन किया जाता है। यदि यह भाष्य पठन शंकर-जयंती के दिवस पर पूज्य स्वामीजी की पावन उपस्थिति में हो, तो भाष्यकार आदि शंकराचार्य जी एवं उनकी रचनाओं के विषय में पूज्य स्वामीजी के लघु उपाख्यान का लाभ भी साधकों को प्राप्त होता है। पूज्य स्वामीजी श्रीशंकराचार्य-पूजन करते हैं, जिसमें साधक बड़े ही उत्साह से भाग लेते हैं।

श्री चित्रापुर मठ, बेंगलूरु में शंकर-जयंती के लगभग छह महीने पूर्व से ही साधकों द्वारा श्रीशंकराचार्य-अष्टोत्तर-शतनामावलि का साप्ताहिक पाठ किया जाता है, जिसका समापन शंकर-जयंती को ही होता है।

जिस अद्वैत परंपरा के सिद्धांत का प्रशिक्षण और उसके संरक्षण का मार्गदर्शन हमें हमारी पावन गुरुपरंपरा से प्राप्त होता है, उस सिद्धांत के प्रतिपादन हेतु हम सभी चिरकाल तक आदि शंकराचार्यजी के ऋणी रहेंगे।


वास्तव में इस अद्वितीय परंपरा में जन्म लेने मात्र से हम धन्य हैं, कृतकृत्य हैं।
 

सारस्वत धाम, हरिद्वार – उद्घाटन समारोह
(वृत्तांत – डॉ. चैतन्य गुल्वाड़ी)

 

चिरकाल से राजस्थान प्रांत के हमारे बंधु-भगिनियों का यह अत्यंत आत्मीय स्वप्न था कि हरिद्वार के पुण्य क्षेत्र में हमारा अपना एक निवास स्थल हो, विशेषकर उन वरिष्ठ यात्रियों हेतु, जो चार धाम की तीर्थ यात्रा का संकल्प कर यहाँ तक पहुंचते हैं। सौभाग्यवश श्री गणपतलालजी सारस्वत (पप्पूजी) के सुयोग्य नेतृत्व में, उनके सहयोगियों के अनवरत परिश्रम से यह स्वप्न शीघ्र ही साकार हुआ, जिन्होंने आवश्यक धनराशि के संचय से हरिद्वार के बीचोंबीच सारस्वत यात्रियों के लिए एक सुंदर तिमंजिले आवास गृह के नवनिर्माण में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

भवन के तैयार होते ही श्री चित्रापुर मठ के मठाधिपति श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी को हरिद्वार के इस पावन सारस्वत धाम के उद्घाटन  हेतु आमंत्रित किया गया। परम पूज्य स्वामीजी ने उनके  विनम्र आमंत्रण को बड़े ही सौजन्य से स्वीकार किया और वे २ जून २०२२ के शुभ दिन हरिद्वार पहुँचे। परम पूज्य स्वामीजी एवं उनके सेवक दल के निवास के लिए निकट ही नकलंक धाम में सुव्यवस्था थी, जहाँ चार दिनों के एक शिविर का भी आयोजन किया गया था। हर दिन प्रातःकाल ही परम पूज्य स्वामीजी उपासना पर विशेष ध्यान देते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के बारहवें अध्याय (भक्ति योग) पर स्वाध्याय सत्र का संचालन करते। शिविर स्थल में स्थित वातानुकूलित विशाल कक्ष में सारस्वत भक्तों की भीड़ इकट्ठी हो जाती। उनके प्रफुल्लित चेहरे भविष्य में अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शन हेतु सारस्वत गुरु प्राप्ति के हर्षोल्लास से दमकते हुए दिखायी देते थे। मध्याह्न में सुप्रसिद्ध कथाकार दीदी कनकलताजी पाराशर द्वारा  “नानी बाई का मायरा “ प्रस्तुत किया जाता। रात्रि का समय पवित्र तुलसीरामायण के पाठ और भक्ति-भजन सहित “जागरण” में बीतता।  

शुक्रवार, ३ जून की सायंकाल को सभागार में एकत्रित भक्तगणों को भगवान भवानीशंकर महादेवजी के दर्शन तथा परम पूज्य स्वामीजी के पावन हस्तों से किए गए देवी पूजन में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माँ भगवती की पूजन-विधि के श्लोकों के  भक्तिपूर्वक पाठ एवं उपासना में भाग लेकर उनकी प्रसन्नता की सीमा न रही। अगले दिन की संध्या को परम पूज्य स्वामीजी की इच्छानुसार परस्पर परिचय के सत्र का आयोजन हुआ, जिसमें दूर दूर के प्रान्तों – महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली इत्यादि से पधारे हुए सारस्वतों ने संक्षिप्त रूप से पूज्य स्वामीजी को अपना अपना परिचय दिया। इसके उपरांत परम पूज्य स्वामीजी द्वारा गाये गए तीन मधुर भजनों पर समस्त भक्तों द्वारा मिलकर गरबा नृत्य प्रस्तुत किया गया। रविवार प्रातःकाल डॉ. चैतन्य गुल्वाड़ी ने एक संक्षिप्त अंतर्जालीय प्रस्तुतीकरण के माध्यम से सभी सारस्वतों को श्री चित्रापुर मठ एवं इसकी विभिन्न गतिविधियों से परिचित कराया। हर दिन लगातार  लगभग ६०० प्रतिभागियों को भंडारा में राजस्थान के विशेष एवं स्वादिष्ट व्यंजनों सहित भोजन भी करवाया जाता था।

और देखते ही देखते वह अंतिम दिन भी आ पहुँचा – सोमवार, ६ जून जब पारंपरिक रंगबिरंगे परिधानों  में महिलाएँ अपने सिर पर सुन्दर कलश रखे, नकलंक धाम के द्वार पर एकत्रित हुईं। परम पूज्य स्वामीजी को एक सुसज्जित बग्घी में विराजित किया गया, जिसे हाँकने का सौभाग्य प्राप्त कर एक सजा हुआ अश्व भी बिलकुल तैयार खड़ा था। तत्पश्चात् यह शोभा यात्रा संगीतमय वादकों के साथ, उच्च स्वरों में उद्घोषित जय-जयकारों के बीच धीमे धीमे हरिद्वार की गलियों से होते हुए उस शामियाने की ओर बढ़ी, जहाँ बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से सजे हुए सारस्वत धाम का उद्घाटन होने जा रहा था। सारस्वत धाम पहुँचने पर सुगंधित गुलाब की पँखुड़ियों के वर्षाव और वेदघोष के साथ परम पूज्य स्वामीजी का स्वागत किया गया। पूज्य स्वामीजी ने अपने पावन हस्तों से द्वार पर स्थित शिलालेख का अनावरण कर मंगल आशीर्वाद सहित सारस्वत धाम का उद्घाटन किया।  इसके उपरांत पूज्य स्वामीजी को संपूर्ण सारस्वत धाम का निरीक्षण करवा कर, हवन और अन्य शास्त्रोक्त विधियाँ संपन्न की गईं। अल्पाहार के पश्चात् परम पूज्य स्वामीजी नकलंक धाम के निवास स्थल को लौटे।

मध्याह्न की धर्म सभा डॉ. राम सारस्वत जी द्वारा ‘सभा प्रारंभ प्रार्थना’ से आरंभ की गई। डॉ. रामजी ने अपने भावपूर्ण वक्तव्य में पूज्य स्वामीजी के साथ मिले सौभाग्यशाली  सान्निध्य एवं  चित्रापुर सारस्वत समाज के साथ सत्संगों के माध्यम से हुए अपने अनुभवों को साझा किया। श्री चित्रापुर मठ की स्थायी समिति के अध्यक्ष, श्री प्रवीण कडले जी ने समस्त सारस्वत समाज का, श्री चित्रापुर मठ, शिराली और श्री दुर्गापरमेश्वरी मंदिर, कार्ला की ओर से स्वागत किया। परम पूज्य स्वामीजी ने अपने आशीर्वचन में श्री गणपतलालजी सारस्वत (पप्पूजी) और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए निःस्वार्थ प्रयासों की प्रशंसा की, जिसके फलस्वरूप इस  सारस्वत धाम का निर्माण हो सका। पूज्य स्वामीजी ने , चित्रापुर सारस्वतों से जुड़कर एक संगठित सारस्वत समाज के निर्माण हेतु प्रदर्शित, राजस्थानी सारस्वत समाज की प्रेम और उत्साहपूर्ण लालसा पर अपनी प्रसन्नता प्रकट की।

इसके उपरांत परम पूज्य स्वामीजी की पावन, गौरवशाली उपस्थिति में सभी छोटे-बड़े दाताओं, स्वयंसेवकों तथा समिति के सदस्यों का शाल, पारंपरिक राजस्थानी पगड़ी, स्मरणिका तथा मालार्पण द्वारा सम्मान किया गया।

७ जून प्रातःकाल समस्त भक्तवृंद नकलंक धाम पर परम पूज्य स्वामीजी को भावभीनी बिदाई देने हेतु एकत्रित हुए , जहाँ से पूज्य स्वामीजी ने अपने अगले गंतव्य स्थल, दिल्ली के निकट ,गाजियाबाद की ओर प्रस्थान किया। 


।। ॐ नमः पार्वती पतये हर हर महादेव ।। 
 

 

गिरीश सारस्वत
गाजियाबाद

 

।। ॐ श्रीगुरुभ्यो नमः ।। श्रीभवानीशंकराय नमः ।। श्रीमात्रे नमः ।।

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सारस्वत ब्राह्मण समाज गाजियाबाद के इतिहास में दिनांक ७ जून २०२२ का दिन स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा । अध्यात्म के क्षितिज में दैदीप्यमान सितारे की भाँति शिखर पर विराजमान सारस्वत शिरोमणि संत, श्री चित्रापुर मठ के ग्यारहवें मठाधिपति परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी के पावन चरण कमल इस दिन हमारे यहाँ पड़े और उनके श्रीमुख से जीवनोपयोगी एवं कल्याणकारी आशीर्वचन सुनकर हम धन्य हो गए ।

सारस्वत ब्राह्मण समाज कल्याण समिति (रजि.) गाजियाबाद के तत्वाधान में विजय नगर के उत्सव भवन में आयोजित कार्यक्रम में अपने श्रीमुख से उपस्थित जन समूह को आशीर्वचन प्रदान करते हुए परम पूज्य मठाधिपति श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी ने कहा कि जप, तप और दान मनुष्य के लिए अत्यंत कल्याणकारी हैं । जप, तप और दान के बिना मानव जीवन व्यर्थ है । उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीविकोपार्जन के लिए श्रेष्ठ कर्म करते हुए नित्य उपासना अवश्य करनी चाहिए । बिना उपासना के लौकिक से अलौकिक की मंगलमय यात्रा असंभव है । इसलिए हमें नित्य योग, प्राणायाम का अभ्यास करते हुए उपासना करनी चाहिए और जप, तप करते हुए दान भी करना चाहिए । इसी में प्राणिमात्र का कल्याण निहित है । उन्होंने बताया कि सांसारिक उपलब्धियों की प्राप्ति हेतु प्रभुचरणों में संकल्प समर्पित कर पूरे मनोयोग से निष्ठा और लगन के साथ मनोवांछित लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रयत्न करने से सफलता अवश्य मिलती है । श्रीमद्भगवद्गीता एवं दुर्गासप्तशती के पाठ एवं स्वाध्याय पर भी उन्होंने बल दिया । मधुर कंठ से कर्णप्रिय स्वर में उनके द्वारा गाया हुआ भजन (श्री जगदंबे सरस्वती....) सुनकर उपस्थित जनसमूह पूरे भक्तिभाव से झूम उठा । सुधबुध और भूख प्यास भूलकर सभी इस परम पावन और दुर्लभ सुखद संयोग के एक एक क्षण का पूर्ण लाभ लेने के लिए आतुर थे । कोई कह रहा था कि यह हमारे जन्मजन्मांतर के संचित पुण्यों का ही फल है जो कि हमें  इतने श्रेष्ठ सारस्वत संत मिले हैं, तो कोई कह रहा था कि अद्भुत, दिव्य एवं भव्य आयोजन - ऐसा लग रहा है कि मानो आत्मा के परमात्मा से मिलन की प्रक्रिया का साक्षात्कार हो । हमें घर बैठे ऐसी महान विभूति की चरण वंदना कर स्वयं को धन्य बनाने का अवसर मिला । क्या बूढ़े,क्या बच्चे ! क्या महिला और क्या पुरुष ! हर कोई बिना पलक झपके एकटक सारस्वत सद्गुरु को निहारते हुए बस यही चाहता था कि ये घड़ी की सुई यहीं ठहर जाए और अनंतकाल तक यूँ ही अनवरत जारी रहे - भजन, कीर्तन और आशीर्वाद का यह सिलसिला ।

आशीर्वचन कार्यक्रम समापन के बाद गाजियाबाद के अतिरिक्त उत्तरप्रदेश के नोएडा, अलीगढ़ , हाथरस, आगरा, मथुरा फिरोजाबाद, हापुड़ व दिल्ली तथा राजस्थान से पधारे हुए सभी श्रद्घालु भाव विभोर होकर पुनः शीघ्र पूज्य स्वामीजी के दर्शन लाभ व निकट भविष्य में होने वाले इसी तरह के कार्यक्रमों की जानकारी चाहते थे । कोई पूज्य स्वामीजी के आमंत्रण के बाद दर्शन और सत्संग का पुनः लाभ लेने के लिए पुण्य पावन भूमि शिराली और कार्ला जाने की योजना बनाने लगा , तो कोई पूज्य स्वामीजी के कार्यक्रमों की वीडियो इत्यादि की जानकारी लेने लगा , तो कोई पूज्य स्वामीजी के साथ ही जाने की बात कहने लगा । एक विलक्षण संत की विशुद्ध आत्मा, सचमुच ईश्वर का ही तो रूप है । भला इस पावन बेला का साक्षी कौन नहीं बनना चाहेगा ?

कार्यक्रम समापन के बाद भी मन में ढाढस बंधा हुआ था कि कोई बात नहीं ! अभी तो पूज्य स्वामीजी भिक्षा ग्रहण करेंगे । इसी बहाने भगवत्स्वरूप गुरुदेव के एक दो बार दर्शन तो हो ही जायेंगे । लेकिन यकायक लगने लगा कि अब हमारे पुण्य बस  इतने ही थे । दुखी मन और सजल नयनों से सारस्वत सद्गुरु की विदाई का क्षण भी आ पहुँचा ! गुरुदेव की खड़ाऊँ की चट-चट की आवाज विचलित करने लगी । ऐसा कौन अभागा होगा जो भगवत्स्वरूप गुरूदेव को अपनी आँखों से ओझल होने देगा ? लेकिन काल का चक्र कब कहाँ रुका है ?

 बड़े भारी मन से क्षमायाचना करते हुए पुनः आगमन की प्रार्थना के साथ सभी ने दण्डवत् प्रणाम करते हुए जयोद्घोष के साथ परम पूज्य श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी को विदा किया ।

इस भौतिक शरीर से दूर जाते हुए परम पूज्य गुरुदेव की आशीर्वाद वाली मुद्रा को हृदय में धारण करके हम निरंतर प्रतीक्षा में हैं कि कब पुनः आएंगे हमारे गुरुवर और कब होंगे भगवत्स्वरूप गुरुदेव के नयनाभिराम दर्शन फिर एक बार  ?

मूल लेख - सुनेत्रा नागरकट्टी

हिंदी भाषांतर - टीम अनुवाद

१३ जुलाई, २०२२

गुरु पूर्णिमा "चातुर्मास" के प्रारंभ की सूचक (तिथि) है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, चार महीने और विशेष रूप से वर्षा ऋतु के। इस अवधि का उपयोग साधकों और संन्यासियों द्वारा साधना व अनुष्ठानों (जप, तप, ध्यान आदि धार्मिक तपस्याओं का अभ्यास) के लिए किया जाता है। संन्यासियों के लिए चातुर्मास के आचरण का एक और तरीका भी है, हाँ यह चार पखवाड़े तक मनाया जाता है, आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (सीमोल्लंघन / उटांवची पुन्नव) तकहमारी चित्रापुर मठ परंपरा के अनुसार हमारे धर्म गुरु मठाधिपति चार पखवाड़ों (पक्ष) अर्थात दो महीने के चातुर्मास व्रत का पालन करते हैं। चातुर्मास व्रत हमारे पूज्य स्वामीजी द्वारा हर वर्ष दो माह की यह संपूर्ण अवधि हमारे पूर्वाचार्यों के पवित्र समाधि स्थलों में से किसी एक स्थल पर सतत निवास करते हुए मनाया जाता है।

गृहस्थों के लिए यह अवधि दुगनी लाभप्रद है उन्हें अपने गुरु की सेवा और श्रवण, मनन, चिंतन, पूज, भजन और जप आदि साधनाओं का अभ्यास गुरु के मार्गदर्शन और निगरानी में करने का सुअवसर मिलता है

 इस पवित्र अवधि में परम पूज्य स्वामीजी  न केवल स्वयं अपना अनुष्ठान करते हैं, बल्कि उपनिषदों, भगवद्गीता, स्तोत्र, या किसी अन्य आध्यात्मिक ग्रंथ के विषयों पर स्वाध्याय के माध्यम से साधकों को प्रबुद्ध करते हैं। हम दो महीने की अवधि के दौरान उनके आशीर्वचनों से भी लाभान्वित होते हैं। पूज्य स्वामीजी  परामर्श सत्रों के माध्यम से साधकों की शंकाओं को दूर करते हैं और उनकी आध्यात्मिक साधनाओं में प्रगति हेतु मार्गदर्शन भी करते हैं। अतः हम चित्रापुर सारस्वत साधक वैयक्तिक व सामूहिक साधना हेतु चातुर्मास की इस अवधि का पालन करते हैं।

चातुर्मास के दौरान नियमपूर्वक अपनी साधनाओं का सतत अभ्यास करने से साधक और भी अधिक आध्यात्मिक लाभ  प्राप्त करते हैं। इन साधनाओं के अंतर्गत इष्ट-मंत्र जप की अतिरिक्त मालाएँ करने अथवा चित्रापुर गुरुपरंपरा चरित्र के  पाठ का संकल्प भी हो सकता है। नियमों के अंतर्गत कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करने, या अन्य कोई तपस्या करने का संकल्प हो सकता है, जैसे जमीन पर सोना, हर दिन एक सुनिश्चित अवधि के लिए प्राणायाम करना इत्यादि चातुर्मास व्रत सरल हो या कठिन, आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा अर्थात गुरु पूर्णिमा पर इसका प्रारंभ हो और भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को इसका समापन होना चाहिए।

 साधक एक संकल्प लेकर अपना निर्णय व्यक्त करता है और ईश्वर के विग्रह या चित्र के सम्मुख प्रार्थना करता है, कि "हे  ईश्वर, मैंने आपकी उपस्थिति में यह व्रत स्वीकार किया है आपके आशीर्वाद से मैं इसका त्याग किए बगैर निर्बाध रूप से सफलता प्राप्त कर सकूं।चातुर्मास के अंतिम दिन साधक अपने व्रत की सफलतापूर्वक पूर्ति हेतु ईश्वर को उनकी कृपा के लिए धन्यवाद देता है और व्रत के दौरान हुई सारी त्रुटियों के लिए क्षमा माँगता है।

व्रत हमारे शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति वर्धन का सशक्त माध्यम है। यह कुछ अवांछित आदतों को ‘ना ‘ कहने की क्षमता को भी दृढ़ करता है, हमारे संकल्प और आत्मविश्वास को बढ़ाता है, हमें और भी अधिक कठिन नियम स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है और इस प्रकार हम धीरे-धीरे निश्चित रूप से अधिक तीव्र, कृतकृत्य साधना की ओर अग्रसर होते हैं।

हमारी साधना गुरु की कृपा से ही सफलतापूर्वक आरंभ, प्रगतिशील एवं पूर्ण हो सकती है। हमें हर कदम पर गुरु के उपदेशों व मार्गदर्शन की आवश्यकता है, ताकि हम सही दिशा में और सही गति से आगे बढ़ सकें। यह गुरुशक्ति ही है जो सतत निरंतर रक्षण और मार्गदर्शन द्वारा मनुष्य को मानव जन्म के लक्ष्य, अर्थात् आत्मज्ञान तक पहुँचने में सहायता करती है। यह स्वाभाविक ही है कि हम सभी ब्रह्मविद्या-प्रवर्तक गुरुओं का स्मरण कर उन के प्रति आदर एवं कृतज्ञता प्रकट करें, जो ब्रह्मतत्त्व के ज्ञान का प्रसार करते हैं। परम पूज्य स्वामीजी गुरु पूर्णिमा पर गुरु मंडल / व्यास मंडल का पूजन कर इसी भावना को व्यक्त करते हैं  

इस दिवस का प्रारंभ भगवान भवानीशंकर सुप्रभातम् से होता है और लगभग ८ बजे परम पूज्य स्वामीजी  उस मठ में श्री चित्रापुर गुरुपरंपरा के हमारे गुरुओं की समाधि का जलाभिषेक करते हैं, जहाँ चातुर्मास व्रताचरण किया जा रहा है।  गुरु समाधियों के जलाभिषेक के साथ साथ पूज्य स्वामीजी उस मठ में प्रतिष्ठित अन्य देवी- देवताओं का भी जलाभिषेक करते हैं।

 तत्पश्चात् प्रधान अर्चक प्रार्थना करते हुए सभी साधकों की ओर से निम्नलिखित शब्दों के साथ संकल्प लेते हैं  ...

"परम पूज्य स्वामीजी अपने चातुर्मास व्रताचरण के लिए यहाँ सुखपूर्वक निवास कर सकें। हम वास्तव में इसे अपना सौभाग्य और आपका आशीर्वाद मानते हैं और अपनी सेवा करने का यह सुअवसर प्रदान करने के लिए हम परम पूज्य स्वामीजी के आभारी हैं। हम प्रसन्नतापूर्वक अपनी पूरी क्षमता से परम पूज्य स्वामीजी की सेवा करेंगे।"

सामूहिक प्रार्थना के पश्चात् पूज्य स्वामीजी अपने कुटीर में लौटते हैं सुबह १० बजे व्यास मंडल पूजन के लिए परम पूज्य स्वामीजी का आगमन होता है इस गुरुपूर्णिमा पूजन में लगभग २ घंटे लगते हैं और इस पवित्र अवसर का अनुभव करने के लिए हमेशा साधक भारी संख्या में एकत्रित होते हैं।

 गुरु पूर्णिमा पूजन में चार अंश होते हैं:

. श्री महागणपति पूजन

. ब्रह्मादि मंडल पूजन

. व्यास मंडल पूजन

. नियमित गुरु पूजन

 गुरुपूर्णिमा पूजन :-

प्रधान संकल्प के बाद, हमारे भट्ट मामों द्वारा मन्युसूक्त-पाठ के साथ पूज्य स्वामीजी द्वारा प्रार्थनापूर्वक पूर्वांग पूजा एवं श्री महागणपति पूजा, बिना किसी बाधा के गुरु पूर्णिमा पूजन को पूरा करने हेतु की जाती है इसके पश्चात् ५७ देवताओं के ब्रह्मादि (यह ‘सर्वतोभद्र मंडल ‘ के नाम से भी जाना जाता है) मंडल का पूजन किया जाता है।

 

 

 रंग-बिरंगे रंगोली पाउडर के साथ एक बोर्ड पर एक मंडल (जैसा ऊपर दिखाया गया है) बनाया जाता है, जिसमें हमारे ब्रह्मांड के प्रत्येक देवता के लिए एक निश्चित स्थान है। प्रत्येक देवता का आवाहन उनके नामों से संबंधित मंत्रोच्चार से किया जाता है। इनमें ब्रह्मा, सोम, इंद्र, अग्नि, अष्टवसु, कश्यप, अत्रि, चामुंडा, वाराही, गदा, त्रिशूल और गंगा सम्मिलित हैं।  प्रत्येक देवता का प्रतिनिधित्व करने के लिए शालिग्राम का उपयोग किया जाता है और उन्हें मंडल पर क्रम से उनके निर्धारित स्थानों पर प्रतिष्ठित कर उन्हें गंध, अक्षत और फूल चढ़ाए जाते हैं।

ब्रह्मादि मंडल के पूजन के बाद व्यास मण्डल/गुरु मण्डल का पूजन प्रारम्भ होता है।

 गुरु या व्यास मंडल

 

 

 

 

व्यास मंडल को बीच में एक छोटे से वृत्त के चारों ओर आठ पंखुड़ियों वाले एक पुष्प के रूप में दर्शाया जाता है, जो बोर्ड पर एक वर्ग में चित्रित किया जाता है। पंखुड़ियों और वृत्त में विविध रंगों वाले अनाज के दाने भरे जाते हैं और पुष्प के बाहर के भाग रंगोली से सजाए जाते हैं।

 परम पूज्य स्वामीजी व्यास पूर्णिमा पर हमारे अपने मठ संप्रदाय द्वारा निर्धारित सुनियोजित तरीके से गुरुशक्ति का आवाहन करते हैं। गुरुशक्ति सदियों से अगणित गुरु-रूपों के माध्यम से प्रकट हुई है, उन्हें सूचीबद्ध करना असंभव है। अतः  नौ गुरुओं के पंचक (गुरु और उनके चार प्रधान शिष्य) का स्वामीजी  द्वारा बड़ी श्रद्धा के साथ आवाहन किया जाता है।

ये नौ पंचक (प्रत्येक समूह में पाँच अर्थात् गुरु और उनके चार प्रधान शिष्य) इस प्रकार हैं। 

हाँ दिशाएँ दक्षिणामूर्ति पंचक के संदर्भ में दर्शाई गई हैं।

. बीच में दक्षिणामूर्ति पंचक

() सनक

() सनातन

() सनतकुमार

() सनंदन

. उत्तर में ब्रह्म पंचक

() अथर्वांगीरस

() श्वेताश्वतर

() भारद्वाज

() नारद

ईशान्य (पूर्वोत्तर) में वशिष्ठ पंचक

() याज्ञवल्क्य

() दत्तात्रेय

() श्वेतकेतु

() पराशर

. पूर्व में व्यास पंचक

() सुमंतु

() जैमिनी

() पैल

() वैशंपायन

. आग्नेय (दक्षिण पूर्व) में कृष्ण पंचक

() भीष्म

 () शुक

() गौड़पाद

() गोविंदपाद

. दक्षिण में भाष्यकार पंचक

() विश्वरूप (सुरेश्वराचार्य)

() पद्मपा

() स्तामलक

() तोकाचार्य

. द्रविड़ाचार्य पंचक नैऋत्य (दक्षिण पश्चिम) में

() विवरणाचार्य

() विद्यारण्य

() आनंदगिरि

()अनुभूतिस्वरुपाचार्य

. पश्चिम में गुरु पंचक

() परम गुरु

() परमेष्ठी गुरु

() परात्पर गुरु

() समस्त ब्रह्मविद्या संप्रदाय प्रवर्तक

. वायव्य (उत्तर पश्चिम) में आत्म पंचक

() अंतरात्मा

() परमात्मा

() सर्वात्मा 

() ब्रह्मात्मा

मंडल में गुरु और उनके चार शिष्यों को यथाक्रम उनकी पंखुड़ियों में प्रतिष्ठित कर उनकी पूजा की जाती है। यहाँ भी गुरुओं और शिष्यों के प्रतीक स्वरुप शालिग्रामों का उपयोग किया जाता है। बीच का वृत्त श्री दक्षिणामूर्ति का स्थान है, शिव का गुरु रूप, जिन्हें प्रायः चार हाथों वाले - एक में रुद्राक्ष माला, एक में पुस्तक, एक में अमृत कलश व एक हाथ  चिन्मुद्रा में, वटवृक्ष के नीचे आसीन रूप में चित्रित किया जाता हैपूज्य स्वामीजी  अपने स्फटिक-शिवलिंग और श्री राजराजेश्वरी देवी के विग्रह को वृत्त में प्रतिष्ठित करते हैं। इस मंडल में कुल नौ गुरुओं और उनके छत्तीस शिष्यों को उनसे संबंधित मंत्रों के साथ गंध, अक्षत और पुष्प चढ़ाकर पूजा की जाती है।

गुरु मंडल पूजा के पश्चात्, स्वामीजी  नियमित गुरु पूजन आरंभ करते हैं। इस पूजन के दौरान वहाँ उपस्थित भक्त स्वामीजी  के पीछे पीछे श्लोकों, प्रार्थनाओं और अष्टोत्तर शतनामावली को दोहराते हैं। स्वामीजी  गुरु अष्टोत्तर शतनामावली के साथ साथ बिल्वपत्र और वेदव्यास अष्टोत्तर शतनामावली के दौरान तुलसी पत्र अर्पित करते हैं।

 पूजा के अंत में परम पूज्य स्वामीजी भक्ति से सराबोर श्री वेदव्यास अष्टक का पाठ करते हैं और अन्य सभी साधक इसे उनके पीछे पीछे दोहराते हैं। स्वामीजी इस वेदव्यास अष्टक का अर्थ भी बताते हैं, जिसमें गुरु व्यासाचार्य की स्तुति उनके सभी गुणों के साथ की जाती है। सुबह के सत्र का समापन श्रीपादुका पूजन और परम पूज्य स्वामीजी द्वारा तीर्थ वितरण के साथ होता है।

शाम को धर्म सभा आयोजित की जाती है और गुरु पूर्णिमा के लिए एकत्र हुए सभी लोग परम पूज्य स्वामीजी के आशीर्वचन को सुनने के लिए उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। गुरु पूर्णिमा का पूरा दिन गुरु और गुरु-शक्ति के स्मरण को समर्पित होता है। सुबह का समय पैंतालीस गुरुओं का स्मरण करते हुए व्यतीत होता हैसंध्याकाल हमारी गौरवशाली श्री चित्रापुर गुरु-परंपरा के ग्यारह गुरुओं को दीपनमस्कार के पाठ के माध्यम से स्मरण करने का समय है। गुरु पूर्णिमा समारोह का समापन रात्रि की मंगलारती के साथ होता है, जिसके पश्चात् हमारे आराध्य देवता भगवान भवानीशंकर महादेव की अष्टावधान पूजा होती है।

 इस प्रकार पूजन, भजन, जप और परम पूज्य स्वामीजी के बहुमूल्य उपदेशों का श्रवण, आदि उपासना के सभी विभिन्न  प्रकार हमारे गुरु पूर्णिमा दिवस को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाते हैं। साधक पूरे चातुर्मास और आने वाले वर्ष में अपनी साधना करने के लिए पूरी तरह से उत्साहित होते हैं। साधना में हमारे श्रद्धा पूर्ण सच्चे प्रयासों से ही हमारे गुरु प्रसन्न होते हैं। तीव्र साधना से चित्त में एकाग्रता आती है, जो अंततोगत्वा हमें मानव जन्म के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर ले जाती है – आत्मज्ञान या मोक्ष, जो गुरु-अवतरण का उद्देश्य है।       

 

 
 
"प्रसन्नोऽस्तु गुरु सदा" यही हमारी सच्ची प्रार्थना  
 

लेखिका – श्रीमती कुशल तल्गेरी बैलूर; सहयोग एवं छायाचित्र – श्रीमती उमा सवूर;  हिंदी भाषांतर – टीम अनुवाद

५ अगस्त २०२२

 

श्रावण मास अपने साथ कई त्यौहार लेकर आता है। इस शुभ महीने के दौरान, चित्रापुर सारस्वत ब्राह्मण समाज की विवाहित महिलाएँ अपने सौभाग्य अर्थात् दीर्घ और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए, प्रति शुक्रवार और रविवार को "चूड़ी पूजा" करती हैं।

पौराणिक महत्व :

ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम सीताजी ने अपने वनवास के दौरान वन्य फूलों और पत्तियों के साथ यह पूजा अर्पण की थी। इसके पश्चात् ही यह पूजा प्रचलित हुई। एक अन्य लोक कथा यह है कि वन्य फूलों को भी देवी-देवताओं को सजाने की तीव्र इच्छा हुई। करुणामय देवताओं ने वन्य फूलों की इच्छा यह कहकर पूरी की, कि विवाहित महिलाओं द्वारा श्रावण के महीने में एक गुच्छे में (कोंकणी भाषा में “चूड़ी “) बाँध कर पूजे जाने के पश्चात्, उन वन्य पुष्पों को देवी- देवताओं पर चढ़ाया जा सकता है।

 

चित्रापुर सारस्वत "चूड़ी पूजा" कैसे मनाते हैं :

परिवार की विवाहित महिलाएँ, प्रात: शीघ्र उठकर शीर्ष-स्नान कर पारंपरिक वस्त्र धारण करती  हैं। पाँच दूर्वा (तीन तृण वाली घास) और पाँच प्रकार के फूलों को इकट्ठे बाँधकर वे एक मनमोहक “चूड़ी” तैयार करती हैं। “पाँच” की यह संख्या बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे पुराणों और इतिहास में यह पाँच पतिव्रता नारियों की प्रतीक है, जिनका स्मरण आज भी विवाह - संस्कार के प्रति श्रद्धा और प्रतिबद्धता के लिए किया जाता है - अहिल्या, मंदोदरी, द्रौपदी, तारा और सीता। इन्हें विवाहित महिलाओं के लिए आदर्श प्रेरणास्त्रोत माना जाता है।

परंपरागत रूप से, स्थानीय और वन्य पौधे ('अनवली', 'घण्टा माड्डो ', 'नेलानिल्ली' और 'पच्चकाना') और फूल ('रत्नगंधी'- मयूरपुष्प, 'सुगंधी'- जिंजर लिली, 'शंखपुष्प'- बटरफ्लाई पीज, 'करवीर'-पीला ओलियंडर और 'रथपुष्प'- पगोडापुष्प) का उपयोग किया जाता है। जिन शहरों में ये फूल और पौधे आसानी से उपलब्ध नहीं होते, वहाँ गुलाब, शेवंती, चँपा इत्यादि को दूर्वा के साथ बाँधकर चूड़ी तैयार की जाती है। आमतौर पर, चूड़ी विषम संख्याओं में बनाई जाती हैं -५, ७, ९, ११, १५, २१ इत्यादि। चूड़ी को अर्पण कर हम ईश्वर के प्रति, वर्षा-ऋतु में खिलनेवाले रंग- बिरंगे फूलों और हरियाली के लिए अपनी कृतज्ञता दर्शाते हैं।

 

चूड़ी
 
 
फूल और दूवाा

 

पूजा के लिए नैवेद्य भी तैयार किया जाता है। शुक्रवार को, आमतौर पर चावल रहित व्यंजनों का भोग चढ़ाया जाता है - उदाहरणार्थ- सूजी या सेवइयाँ की खीर, सूजी का हलवा, गुड़ से बने हुए मीठे पोहे, हयग्रीव (चना दाल, पानी, गुड़, कसा हुआ नारियल, घी, काजू, किशमिश, जायफल और इलाइची पाउडर से बना हुआ मीठा पकवान) आदि। रविवार के दिन,“उँड्लकाल” नामक एक विशेष मीठा नैवेद्य पकाया जाता है, जिसे चावल के आटे, पानी, नारियल के दूध, हल्के से नमक और गुड़ से बनाया जाता है। “चून”, एक मीठा व्यंजन है जो कसे हुए नारियल, गुड़ और इलाइची पाउडर से बनता है, अथवा “कणयेंद्री”- सूजी, गुड़, घी और नारियल के दूध से बना हुआ नैवेद्य भी रविवार के दिन बनाया जाता है।

 

चूड़ी और नैवेद्य के तैयार होने के पश्चात्, तुलसीजी के सामने एक सुंदर रंगोली रचाई जाती है। एक तांबूल के ऊपर, चूड़ी को एक सुपारी, नैवेद्य, हल्दी, कुंकुम, थोड़े से फूल और अक्षत के साथ रख कर तुलसीजी को अर्पण किया जाता है। पहली चूड़ी, दो तांबूल और सुपारी के साथ तुलसीजी को समर्पित कर आशीर्वाद की विनती की जाती है।

तुलसी पूजा के पश्चात्, घर के बाहर रंगोली सजायी जाती है।  दहलीज के दोनों ओर हल्दी और कुंकंम चढ़ाकर, दोनों ओर एक-एक चूड़ी रखी जाती है। शेष सीढ़ियाँ घर की अविवाहित कन्याओं के द्वारा सजायी जाती हैं। घर के भीतर की ओर उन्मुख होकर लक्ष्मी देवीजी की आरती करके उनसे घर में सुख- शांति के आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है। कई घरों में, “भाग्यदा लक्ष्मी बारम्मा” यह सुप्रसिद्ध पारंपरिक भजन गाया जाता है। इसके पश्चात्, सूर्य देवता को अर्घ्य अर्पण किया जाता है - सर्व प्रथम अक्षत समर्पित करके, सूर्य देवता का दर्शन करते हुए, उन्हें कलश से जल अर्पित किया जाता है। इसके दौरान, नवग्रह स्तोत्र (जपाकुसुम संकाशम… दिवाकरम्) के प्रथम श्लोक का उच्चारण किया जाता है।

(पृष्ठ १४७, श्री चित्रापुर स्तुतिमंजरी २०१९ (संस्कृत) 

फिर रसोईघर में चावल रखनेवाले डिब्बे को सजाया जाता है। उसे हल्दी और कुंकुम चढ़ाकर एक चूड़ी अर्पित की जाती है। परंपरागत रूप से, गाँवों में छाँछ की मथनी खव्लॉ एक खूँटी  से बंधी हुई रहती है। उस खूँटी और घर के कुएँ को भी एक -एक चूड़ी अर्पित की जाती है।

रविवार के दिन, एक साफ, धुले हुए तांबूल या केले के पत्ते के पिछले भाग पर, सात पत्थर रखे जाते हैं। प्रत्येक पत्थर को हल्दी- कुंकुम से लेप कर उस पर एक चूड़ी रखी जाती है। कहा जाता है कि यह सप्तर्षि-पत्नियों के प्रति सम्मान और उनसे आशीर्वाद-याचना का प्रतीक है।

श्रावण के पहले शुक्रवार को घर के मंदिर में कुलदेवी/देवता के लिए एक चूड़ी रखी जाती है। एक चूड़ी, स्थानीय मंदिर में क्षेत्र देवता को अर्पित की जाती है। परिवार की दिवंगत सुहागिनों का स्मरण करके उन्हें भी एक एक चूड़ी अर्पित की जाती है। अंत में घर की वरिष्ठ महिलाओं को तांबूल और सुपारी के साथ चूड़ी अर्पित करके उनका आशीर्वाद पाया जाता है। महिलाएँ एक-दूसरे के घर जाकर भी वरिष्ठ महिलाओं को चूड़ी अर्पित करती हैं। यह परंपरा, पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को और भी दृढ़ करने में समर्थ हुई है।

नवविवाहित दुल्हन की पहली चूड़ी पूजा उसके मायके में आचरित की जाती है। माँ अपनी बेटी को अपने साथ रिश्तेदारों के घरों में ले जाती है, जहाँ दुल्हन उम्र में स्वयं से बड़ी महिलाओं को चूड़ी प्रदान करती है। वे उसे प्रेमपूर्वक उपहार और आशीर्वाद प्रदान करती हैं। विवाह के दूसरे वर्ष में बेटी अपनी सास के साथ पूजा करती है, जो फिर उसे अपने साथ रिश्तेदारों के घर ले जाती हैं।

चूड़ी - पूजा एक बहुत ही सुंदर परंपरा है जो न केवल सामाजिक संबंधों को अपितु वैवाहिक जीवन को भी, देवी- देवताओं और वरिष्ठों के आशीर्वाद से और अधिक सशक्त करने में भी मदद करती है।