गुरुपरंपरा

श्री चित्रापुर गुरुपरंपरा


अत्यन्त बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और आध्यात्मिकता के वरदान से अनुग्रहित  स्मार्त सारस्वत समाज,  हिमालय के परिसर में, कुरुक्षेत्र की उत्तरी दिशा में बहती सरस्वती नदी की वादियों में फला फूला।  सर्वप्रथम सरस्वती नदी के सूखने की वजह से इस सारस्वत समुदाय को स्थानांतरण करना पड़ा | तत्पश्चात्, मुस्लिमों के लगातार आक्रमणों के परिणामस्वरूप, ईसा की १५ वीं शताब्दी में, इस समुदाय को विवश होकर फिर से दक्षिण की ओर  प्रस्थान करना पड़ा | ऐसी स्थिति में वे कर्नाटक राज्य के एक प्रांत में पहुँचे | समय चलते, इस सारस्वत समुदाय की निष्ठा, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता को देख, वहाँ के नगर संस्थान के राजा ने सारस्वत समाज के लोगों को ऊँचे पदों पर नियुक्त किया | इतनी शीघ्र इनकी प्रगति देख, वहाँ के पुराने दरबारियों ने, मन में उत्पन्न हुई ईर्ष्या, जलन और क्रोधवश  इन सारस्वतों को राजा के सम्मुख नीचा दिखाने की ठान ली I यही वजह थी कि राजा ने सारस्वतों के अग्रगण्य व्यक्तियों  को बुलाकर आदेश दिया कि अपना ब्राह्मणत्व  प्रमाणित करें ।  हमें बतायें कि आपके गुरु कौन हैं और उन्हें भी हमारे समक्ष प्रस्तुत करें | सारस्वतों की दृढ श्रद्धा और निष्ठा ही तब उस व्यथित समाज का आलंबन बनी I समाज के वरिष्ठ सदस्यों ने गोकर्ण स्थित भगवान महाबलेश्वर मंदिर में शिवजी के चरणों में कठिन तप और तीव्र प्रार्थना करने का निश्चय किया | इस उपासना के फलस्वरूप समाज के एक वयोवृद्ध भक्त को ईश्वर ने दृष्टांत दिया और उसी के अनुसार एक तेजस्वी संन्यासी अगले दिन सायंकाल, कोटितीर्थ सरोवर के किनारे गुरुरूप में प्रकट हुए | अपने साथ झोली में श्री भवानीशङ्करजी की मूर्ति लिये, वरदानस्वरुप आये, ये संन्यासी ही हमारे प्रथम गुरु, स्वामी परिज्ञानाश्रम प्रथम  थे | इनके द्वारा लाई गई श्री भवानीशङ्करजी की मूर्ति की प्रतिष्ठा गोकर्ण स्थित श्री भण्डीकेरी मठ में की गयी | पूज्य स्वामीजी ने सारस्वत समाज का गुरुपद संभालने हेतु स्वीकृति देकर नगर संस्थान के राजा  से भेंट करने पर भी अपनी सहमति प्रकट की | स्वामी परिज्ञानाश्रम गुरुदेव, “आश्रम” परंपरा से जुड़े हुए थे | आश्रम सम्प्रदाय उन दस संप्रदायों में से एक है, जो, आदिशंकराचार्य जी ने, संन्यास परंपरा को सुनियमित करने हेतु स्थापित किये थे । इस प्रकार से उन्होंने सनातन धर्म को प्रतिपादित कर, उसके प्रति जनसाधारण को सही दृष्टिकोण दिया | आदि शंकराचार्यजी ने संपूर्ण भारतवर्ष की तीन बार पदयात्रा की | उन पदयात्राओं के दौरान, आदि शङ्कराचार्यजी ने अद्वैत सिद्धान्त के प्रचार, प्रसार और पदोन्नति के लिए चार मठों की स्थापना की | आगे चलकर उनके शिष्यों ने भी इस दिशा में सराहनीय कार्य किया |

यद्यपि नगर संस्थान के राजा ने श्रीमत् परिज्ञानाश्रम स्वामीजी की निस्संग्दिग्ध योग्यता को स्वीकार किया, फिर भी राजा  इस स्वीकृति पर श्रृङ्गेरी जगद्गुरु की मान्यता चाहता था | हमारे गुरुवर्य स्वामी परिज्ञानाश्रम ने  इसे तुरन्त मान लिया और वे श्रृङ्गेरी मठ की ओर अपने सेवक गणों सहित चल पड़े | जब स्वामीजी सायंकाल बीते श्रृङ्गेरी शारदाम्बा मन्दिर पहुँचे तब वहाँ के अर्चकों ने परम पूज्य स्वामीजी को बिना पहचाने उन्हें यथोचित सम्मान दिए बिना ही मंदिर के द्वार बंद कर दिए | परमपूज्य स्वामीजी बिना किसी प्रतिक्रिया के अपने निवास स्थान को चले गए | देर रात श्रृङ्गेरी जगद्गुरु को स्वप्न में दर्शन देकर शारदा देवी ने मठ के परिसर में मर्यादा के उल्लंघन का संकेत दिया | जगद्गुरु ने शीघ्र ही मंदिर पहुँचकर देखा कि वास्तव में  देवी शारदाम्बा के मुख की तेजस्वी आभा से हमारे गुरुवर्य का मुखकमल विलसित हो रहा है और देवी की दैदीप्यमान मूर्ति  स्वयं निस्तेज हो गई है | जगद्गुरु ने अपने अर्चकों से उनके अपराध की क्षमा याचना करवाकर, स्वामीजी को यथोचित सम्मान प्रदान किया और नगर राजा के नाम अपेक्षित मान्यता पत्र भी सहर्ष दे दिया - जिसका आशय था कि स्वामी परिज्ञानाश्रम सारस्वत समुदाय के सर्वतोपरी  गुरु हैं |  इस मान्यतापत्र की औपचारिक स्वीकृति के बाद, स्वामीजी ने गोकर्ण में भण्डिकेरी मठ की स्थापना की | उन्होंने वहाँ एक दशक से भी अधिक समय तक अत्यन्त जिज्ञासु सारस्वत समाज को शास्त्रों के अमूल्य ज्ञान से प्रबोधित किया | तत्पश्चात्, शिष्य स्वीकार कर केवल चौदह दिन उपरान्त समाज को दिए एक उपदेश में गुरुस्वामी को यथोचित सम्मान व प्रेम देने का महत्त्व समझा कर उसी दिन उन्होंने महासमाधि ग्रहण की |
 

वर्ष १७२० की चैत्र शुद्ध पूर्णिमा के दिन, भक्तगणों की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए, परम पूज्य प्रथम परिज्ञानाश्रम स्वामीजी ने हरिटेकर परिवार के कृष्णय्या कुलकर्णी के इकलौते सुपुत्र का शिष्य रूप में चयन किया और उन्हें शंकराश्रम नामाभिधान से सम्मानित किया | मठ को अपना पुत्र प्रदान करने के उपलक्ष्य में, कृष्णय्या कुलकर्णी को मठ का प्रशासनिक कार्यभार सौंप दिया गया | उनके कुल को “शुक्ल भट” उपाधि दी गयी और उन्हें वचन दिया गया कि भविष्य में भी शिष्य का चयन करते समय सदैव उनके शुक्ल कुल को प्राथमिकता दी जायेगी |  

परम पूज्य श्रीमत् शंकराश्रम (प्रथम) स्वामीजी को शिष्य स्वीकार के केवल १४ दिन बाद ही मठाधिपत्य का कार्यभार संभालना पड़ा | परन्तु अल्प अवधि की सूचना के बावजूद उनका संतुलित व्यवहार और बुद्धिमत्ता, इस उत्तरदायित्व को निभाने की योग्यता के द्योतक थे | जनसामान्यों के आध्यात्मिक उत्थान के लिये निरंतर प्रयत्नशील, परम पूज्य स्वामीजी ने अपने उपदेशों द्वारा लोगों को सतत स्मरण करवाया कि सुख और दुःख दोनों सदा आते जाते रहते हैं | इसलिये, चञ्चल मन के ऊपर प्रभुत्त्व पाना ही मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य रहे I ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जब किसी अतिशय निर्धन व्यक्ति ने विनम्र भाव से और निष्ठा पूर्वक अपनी परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना की और परम पूज्य स्वामीजी के अनुग्रह और आशीर्वाद से उसे चमत्कारिक लाभ हो गया |

परम पूज्य शंकराश्रमस्वामीजी (प्रथम) के कार्यकाल में ही नगर संस्थान के राजा बसप्पा नायक (द्वितीय) ने, वर्ष १७३९ में एक दानपत्र द्वारा मठ की आमदनी के लिए जमीनें प्रदान कीं | वर्ष १७५७ में परम पूज्य स्वामीजी भटकल गाँव से गोकर्ण की ओर जाते समय अचानक अस्वस्थ हो गए | भटकल के समीप स्थित शिराली के भक्त जनों ने स्वामीजी की बीमारी के कारण, उनसे बिनती की कि वे स्वस्थ होने तक शिराली में ही रुके  रहें | शिराली स्थित धर्मनिष्ठ नागरकट्टी कुटुंबियों ने परम पूज्य स्वामीजी का आदरपूर्वक आतिथ्य किया | किंतु भटकल गाँव के सारस्वतों  ने परम पूज्य स्वामीजी का यथोचित सम्मान व सत्कार नहीं किया था | शिराली स्थित भक्त जनों ने स्वामीजी के क्षीण होते हुए स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उनसे शिष्य स्वीकार करने की प्रार्थना की, ताकि गुरुपरंपरा अखंडित चलती रहे | परन्तु परम पूज्य स्वामीजी ने प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया | तत्पश्चात् कुछ ही दिनों में परम पूज्य स्वामीजी ने महासमाधि ग्रहण की  | गुरु के अभाव में सारस्वत समाज फिर एक बार अनाथ हो गया |

उदार नागरकट्टी कुटुंबियों ने अत्यंत भक्तिपूर्वक परम पूज्य स्वामीजी के समाधिस्थल के निर्माण हेतु अपने घर की जमीन मठ को दान कर दी | इस समाधि को बड़ी समाधि के नाम से जाना जाता है | परन्तु समाधि के साथ ही, परशुराम क्षेत्र स्थित इस पवित्र भूमि के लिये ईश्वर का कुछ और भी संकल्प था | समाज के वरिष्ठ लोगों ने एकमत से भगवान भवानीशंकरजी की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा भी इसी समाधि के पावन स्थल पर करने का निर्णय लिया | यही कारण है कि यह विलक्षण स्थल समस्त विश्व से भक्त जनों को आकर्षित करता है | यहाँ संस्थापित यह पवित्र श्री चित्रापुर मठ, हताश साधकों को मायके की तरह पुनः उज्जीवित - उत्साहित करता है I 
नागरकट्टी कुटुंबियों ने बड़ी उदारता से अपने घर की जमीन मठ को दान में दी I इस उदार सेवा के सम्मान में आज भी रथोत्सव के समय, श्री भवानीशंकर की मूर्ति को फलसमर्पण करने का मान सर्वप्रथम उन्हें दिया जाता है |
 

शिष्यस्वीकार के बिना परम पूज्य शङ्कराश्रम स्वामीजी ने महासमाधि ली I आध्यात्मिक गुरु के अभाव में सारस्वत समाज को फिर एक बार ईर्ष्या और क्रोध से परिपूर्ण जनसमुदाय का सामना करना पड़ा | नगर संस्थान के राजा ने फिर से धमकाया कि अगर सारस्वत समाज अपने धर्मपीठ के लिये उत्तराधिकारी तुरन्त खोज नहीं लेता है, तो मठ की सारी संपत्ति जब्त कर, मठ को ताला लगा दिया जायेगा !

भाग्यवश किसी ने स्मरण दिलाया कि परम पूज्य शङ्कराश्रम स्वामीजी द्वारा दीक्षित, एक साधना निरत तरुण सारस्वत, पास ही कोल्लूर ग्राम में रहते हैं | समाज के वरिष्ठ जनों द्वारा मठाधिपत्य स्वीकार करने की तीव्र प्रार्थना पूज्य स्वामीजी ने अनुग्रह्पूर्वक स्वीकार की I स्वामीजी को यथोचित सम्मानपूर्वक शिराली लाकर परिज्ञानाश्रम स्वामी (द्वितीय) नामाभिधान से श्री चित्रापुर मठ में विधिपूर्वक पट्टाभिषेक किया गया |

परम पूज्य स्वामीजी द्वारा धर्म के सिद्धान्तों पर दिए गए उपदेशपूर्ण प्रवचनों ने समाज की ईश्वर, गुरु और मठ के प्रति श्रद्धा और भक्ति को बढ़ावा दिया I मठ के अभिलेखों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिनमें  इन महान यतीश्वर के  केवल आशीर्वाद और दर्शन द्वारा ही कई लोगों की स्वास्थ्यप्राप्ति अथवा उनमें आंतरिक बदलाव लाने के चमत्कारिक विवरण हैं |

समयानुसार, बढ़ती आयु में, परम पूज्य स्वामीजी की गतिविधियों में कुछ स्वाभाविक शिथिलता आने लगी I समाज ने मठ की पवित्र गुरुपरम्परा को आगे बढ़ाने के लिए परम पूज्य स्वामीजी से शिष्य स्वीकार करने की प्रार्थना की | परम पूज्य स्वामीजी का अनुमोदन मिलते ही, समाज के गणमान्य सदस्य  सुयोग्य उत्तराधिकारी की खोज में जुट गए | शीघ्र ही, उन्होंने मल्लापुर स्थित शुक्ल परिवार के एक अत्यंत योग्य युवा साधक का चयन किया | इस पवित्र कार्य के लिए साधक के पिताजी की अनुमति मिलते ही परम पूज्य स्वामीजी ने मल्लापुर आकर विधिपूर्वक शिष्य स्वीकार किया I इस शुभ समारंभ में शिष्य स्वामीजी को दीक्षा देकर शंकराश्रम (द्वितीय) इस नामाभिधान से अलङ्कृत किया | महासमाधि का समय आने पर परम पूज्य स्वामीजी ने अपने शिष्य को उपदेश किया कि वे अत्यन्त प्रेम और आत्मीयता से अपने समाज के लोगों का संतान की तरह पालन करें I उन्होंने आश्वासन दिया कि शिष्यस्वामी अपने आध्यात्मिक स्तर पर उच्चतम गति को प्राप्त  करेंगे | तत्पश्चात् परम पूज्य स्वामीजी ने शान्ति और समाधानपूर्वक महासमाधि ग्रहण की । शिराली मठ में बड़ी समाधि और श्री भवानीशंकरजी के मंदिर के सम्मुख खड़े होने पर परम पूज्य परिज्ञानाश्रम स्वामीजी (द्वितीय) की समाधि का दर्शन होता है |
 

परम विद्वान और योगी परम पूज्य शंकराश्रम स्वामीजी (द्वितीय), आज तक  भगवान दत्तात्रेय के साक्षात् अवतार स्वरूप पूजनीय माने जाते हैं | आध्यात्मिक मार्ग पर उनकी पूर्ण तल्लीनता के कारण उनका शारीरिक स्वास्थ्य क्षीण हो रहा था इसलिए भक्तगणों ने परम पूज्य स्वामीजी से शिष्य स्वीकार करने का  निवेदन किया | परम पूज्य स्वामीजी की अनुमति पाते ही योग्य शिष्य की खोज आरम्भ हुई  | तलगेरी कुटुम्ब में एक बहुत ही होनहार तरुण था | उसके परिवार की अनुमति पाकर परम पूज्य स्वामीजी ने शिष्यस्वीकार किया I शिष्य स्वामी को पवित्र शिष्योपदेश से अनुग्रहित कर उन्हें  केशवाश्रम नामाभिधान से अलंकृत किया |

हमारी गुरुपरम्परा के पूर्वाचार्यों  के कार्य काल में हुए अनेक चमत्कारों की तरह परम पूज्य स्वामीजी से संबंधित कई चमत्कार प्रसिद्ध हैं | एक बार तीव्र ज्वर से पीड़ित परम पूज्य स्वामीजी ने अपने अनुष्ठान के दौरान ज्वर के कारण आयी कंपकंपी को अपने  “दण्ड” पर स्थानांतरित कर दिया, किन्तु यह स्थानान्तरण केवल अनुष्ठान की अवधि तक ही सीमित था और अनुष्ठान के संपन्न होते ही  उन्होंने  ज्वर को पुनः अपने शरीर में धारण कर लिया | एक और घटना भक्तों को याद है जहाँ तेज आग से गरम तेल में भी “बड़े” तलकर ऊपर नहीं आ रहे थे | वास्तव में उस दिन  परम पूज्य स्वामीजी को उनकी नित्यनियम से दी जानेवाली चावल की कांजी नहीं दी गयी थी क्योंकि उस दिन परम पूज्य स्वामीजी के गुरु परम पूज्य स्वामी परिज्ञानाश्रम जी (द्वितीय) की पुण्यतिथि थी ।  प्रतिदिन की  तरह पूज्य स्वामीजी को  चावल की कांजी की बजाय पुण्यतिथि  के उपलक्ष्य में पकाए गए अन्य पकवान भिक्षा में परोसने  का निर्णय लिया गया था इसलिए चावल की कांजी पकाई ही नहीं गयी थी | जब “बड़े” न तलने की घटना परम पूज्य स्वामीजी को बतायी गयी  तब स्वामीजी ने “यहाँ हमारे उदर में प्रज्वलित अग्नि के शान्त न होने तक तेल में गरमाहट कैसे पहुँचेगी?”  कहकर घटना को हँस कर टाल दिया | उसके बाद शीघ्र ही चावल की कांजी  की भिक्षा परम पूज्य स्वामीजी को परोसी गयी और उसके उपरान्त ही “बड़े” यथाविधि तलकर आने लगे |   

ऐसा ही एक अन्य विलक्षण प्रसंग अभिलिखित  है । परम पूज्य शङ्कराश्रम स्वामीजी के महासमाधि लेने के वर्षों बाद, परम पूज्य स्वामी पाण्डुरङ्गाश्रमजी  ने मल्लापुर जाकर परम पूज्य शङ्कराश्रम स्वामीजी के समाधि स्थल के जीर्णोद्धार हेतु, समाधि पर स्थित पत्थर  हटवाया  था । तब समाधि  के निर्माण के  समय अर्थात् करीब एक शतक पूर्व अर्पित किए गए फूल, बिल्वपत्र और तुलसी दल उतने ही ताजे दिखाई दिए और समाधि खोलते ही इन फूलोंकी खुशबू से वातावरण सुगन्धित हो उठा | 
 

हमारी पावन गुरुपरंपरा के पंचम सद्गुरु परम पूज्य केशवाश्रम स्वामीजी ने अपने बोधप्रद प्रवचनों से और अपने दीप्तिमान आध्यात्मिक  व्यक्तित्व से सारे समाज को प्रचोदित किया | इस कारण, समाज ने बड़ी प्रसन्नता  से  अपनी आय  का एक अंश अपने प्रिय मठ की  देखभाल के लिए देना शुरू किया | इससे मठ की आमदनी में वृद्धि हुई और मठ की ओर से कुछ खेत और जमीनें खरीदी गयीं | परम पूज्य स्वामीजी का  समर्थ मठाधिपत्य लगभग चार दशकों तक चला  | 

हालाँकि ज्ञानी महात्मा चमत्कारों को अधिक महत्त्व नहीं देते परन्तु उनकी स्वाभाविक दिव्यता के कारण “चमत्कार” भी अनायास ही घटित हो जाते हैं । अतः यह स्वाभाविक ही था कि मुर्डेश्वर ग्राम के एक भक्त दम्पति का पुत्र, जो जन्म के बाद एक शब्द भी नहीं बोल पाया था, परम पूज्य स्वामीजी के दर्शन के कुछ समय बाद ही बोलने लगा। ऐसा ही एक अन्य उदाहरण - मंगलुरु शहर का एक निर्धन भक्त, जिस की जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी, वह परम पूज्य स्वामीजी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पैदल ही चल पड़ा। चलते चलते कुछ समय के उपरान्त अत्यधिक थकान से उसे एक बरगद के पेड़ के नीचे विश्राम लेना पड़ा। उसके पाँवों में सूजन थी और दर्द भी इतना था कि उसे लग रहा था कि परम पूज्य स्वामीजी के दर्शन के बिना ही उसका अंत हो जाएगा | सोते हुए गहरी नींद में उसने स्वप्न देखा कि परम दयालु स्वामीजी, स्वयं उसके पाँवों में एक औषधियुक्त सुगंधित तेल लगा रहे हैं। जब उसकी नींद खुली, आश्चर्यचकित होकर उसने पाया कि उसके पाँवों में न तो सूजन थी, न ही दर्द। लेकिन उस औषधियुक्त तेल की महक तब भी वातावरण में थी। अवर्णनीय कृतज्ञता से भरा वह शीघ्र ही मठ पहुँच गया और असीम कृतज्ञता और भक्तिभाव से परम पूज्य स्वामीजी के चरणों में गिर पड़ा। 

कालान्तर में  भक्तगणों ने परम पूज्य स्वामीजी से शिष्य स्वीकार के लिए प्रार्थना की। मंगलुरु के शुक्ल भट परिवार से एक सुयोग्य युवक का चयन किया गया।  परम पूज्य स्वामीजी ने वर्ष १८०४ में शिराली में पवित्र शिष्य स्वीकार समारंभ संपन्न किया और अपने शिष्य को ‘स्वामी वामनाश्रम’ नामाभिधान प्रदान किया। लगभग  दो दशकों तक परम पूज्य स्वामीजी ने अपने शिष्य को योगाभ्यास, अध्यात्म मार्ग और मठाधिपत्य के सभी उत्तरदायित्वों में प्रशिक्षित किया। परम पूज्य केशवाश्रम स्वामीजी ने वर्ष १८२३ में शिराली में महासमाधि ग्रहण की। श्री चित्रापुर मठ में बड़ी समाधि के सम्मुख खड़े होने पर आपके बायीं ओर स्थित समाधियों में आखिरी समाधि परम पूज्य केशवाश्रम स्वामीजी की समाधि है।
 

अतिशय करुणामय और साधना में पूर्णतया निमज्जित, परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी मठ के प्रशासकीय कार्यों में ज्यादा ध्यान नहीं दे सकते थे । अतः शुक्ल कुटुंब से एक व्यक्ति को प्रबंधक नियुक्त किया गया । पर वे भी इस कार्य को कुशलता से नहीं कर पाये। तब समाज के वरिष्ठ लोगों ने सोचा कि मठ की प्रशासकीय कार्यभार को संभालने के लिए परम पूज्य स्वामीजी से शिष्य स्वीकार की प्रार्थना करना उचित होगा I 

उन दिनों परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी के सेवक वर्ग में नगरकर परिवार से परमेश्वर नामक एक होनहार युवक था, इसके पहले यह युवक निर्धनता के कारण मंगलुरु के एक धनिक परिवार में उनके छोटे मोटे काम किया करता था। एक बार धनिक के घर आये एक ज्योतिषी ने इस युवक को देख  भविष्यवाणी की कि यह युवक आगे चल कर महत्त्वपूर्ण पद पर स्थापित होकर लोगों के अतिशय आदर और सम्मान का पात्र होगा । अतः उससे निम्न कोटि के कार्य करवाना उचित नहीं है । परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी के विट्ठल ग्राम में वास्तव्य के समय वहाँ के अर्चक ने भी इस युवक की असाधारण क्षमताएँ परख लीं । उन्होंने शिष्य स्वीकार के लिए इस युवक के चयन का सुझाव दिया । समाज के गणमान्य व्यक्तियों के  समर्थन से परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी ने शिराली पहुँचते ही शिष्यस्वीकार करना स्वीकार किया। वर्ष १८३६ में उन्होंने स्वीकृत शिष्य को विशिष्ट समारंभ में विधिपूर्वक दीक्षित कर ‘स्वामी कृष्णाश्रम’ नामाभिधान प्रदान किया।
    
परन्तु परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी ने समाज के प्रस्ताव के अनुरूप शिष्य स्वामी द्वारा मठ का प्रशासकीय कार्यभार संभालना स्वीकार नहीं किया। शायद उन्हें पहले से ही अवगत था कि निकट भविष्य में ही कृष्णाश्रम शिष्यस्वामीजी को मठाधिपत्य स्वीकार करना होगा। तत्पश्चात् शीघ्र ही परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी चेचक के रोग से ग्रस्त हो गए । “मेरा संकल्पित कार्य अब सिद्ध हो गया है,” यह कहते हुए संपूर्ण समाज को आशीर्वाद देकर वर्ष १८३९ में मंगलुरु ग्राम में परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी ने महासमाधि ग्रहण की। परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी के अंतिम दिनों में ज्वर की उग्रता को कम करने के लिए उन्हें कच्चे नारियल का पानी दिया जाता था । अतः आज भी भक्तजन परम पूज्य वामनाश्रम स्वामीजी की समाधि पर कच्चे  नारियल के पानी का अभिषेक करवाते हैं ।

परम पूज्य श्रीमत् कृष्णाश्रम स्वामीजी के कार्यकाल में सारस्वत समाज की बहुत उन्नति हुई, क्योंकि पूज्य स्वामीजी न केवल एक विद्वान और आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे बल्कि एक कुशल प्रशासक भी थे | उनके निर्देशन में मठ के योग्य प्रबंधक लाज्मी वेन्कटरमणैया ने अत्यन्त कुशलता से कार्य किया | इस कारण मठ की संपत्ति में बढ़त हुई और श्रीभवानीशंकरजी के अलंकार के लिए नूतन आभूषण बनवाये गए | 

महात्मा के आशीर्वाद की शक्ति एक भक्त के भाग्य में कैसे  परिवर्तन ला सकती है, यह प्रसंग नागरकट्टी दुर्गप्पया नाम के एक भक्त की कहानी से भली भांति स्पष्ट होती है | परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी के आदेश के अनुसार, दुर्गप्पय्या जी सप्तशती ग्रन्थ का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करते थे इसके परिणामस्वरूप न केवल उनकी आर्थिक परिस्थिति में सुधार हुआ  अपितु उन्हें समाज में आदर भी मिला | एक बार, परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी के मंगलुरु वास्तव्य में समाज के वरिष्ठों ने उनके सामने शिष्य स्वीकार का प्रस्ताव रखा। परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी की स्वीकृति पाकर नगर परिवार के युवक का चयन किया गया, जिसमें मठाधिपत्य के लिए सभी आवश्यक गुण थे, | वर्ष १८५७ में परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी ने इस युवक को पवित्र मंत्रदीक्षा देकर शिराली में शिष्यस्वीकार किया और शिष्य को पाण्डुरङ्गाश्रम नामाभिधान  प्रदान किया | 

एक बार शिष्य श्रीमत् पाण्डुरङ्गाश्रम स्वामीजी ने ही वेन्कटापुर ग्राम में होने वाले रथोत्सव के बारे में सुना | रथोत्सव वह उत्सव है जिसमें विशिष्ट रीति से बनवाये गये नक्षीदार रथ में  भगवान की मूर्ति को सजाकर, रथ को खींचते हुए नगर भ्रमण करवाया जाता है | शिष्य स्वामीजी ने गुरुस्वामीजी से वेन्कटापुर रथोत्सव में भाग लेने की इच्छा प्रकट की | परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी ने समझाया कि भावी मठाधिपति का निमंत्रण के बिना किसी अन्य समारोह में जाना उचित नहीं होगा I  तब  परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी ने श्री चित्रापुर मठ में ही रथोत्सव आयोजित करने का निश्चय किया, जिससे शिष्य स्वामीजी के साथ-साथ समाज में भी  उल्लास और  उमंग की लहर दौड़ पड़ी | वर्ष १८६२ से चित्रापुर मठ का यह भव्य रथोत्सव, प्रतिवर्ष चैत्र शुद्ध पूर्णिमा के दिन संपन्न होता आ रहा है | धातु तथा लकड़ी के काम में कुशल कारीगरों को रथ निर्माणकार्य के लिए आमंत्रित कर, उनकी सुविधा की व्यवस्था करवाई गई | ताकि उनका सृजनात्मक कार्य सुचारू रूप से संपन्न हो, सारे वातावरण में  रथोत्सव का  उत्साह दिखाई दे रहा था | अनेक छोटे व्यापारियों ने अपनी दुकानें मठ-परिसर में लगायीं | मठ में, दूर दूर से आनेवाले अतिथियों के आवास और स्वागत की व्यवस्था बहुत पहले से ही शुरू की गयी | यह चिर प्रतीक्षित वार्षिकोत्सव, परम पूज्य आनन्दाश्रम स्वामीजी के कार्यकाल में कुछ समय के लिए कई अनिवार्य कारणों से स्थगित करना पड़ा था | परन्तु, हमारे दशम गुरु परम पूज्य परिज्ञानाश्रम स्वामीजी (तृतीय) ने उचित परिस्थितियों में यह रथोत्सव पुनः आरंभ किया जिसकी आज भी भक्तगण हर वर्ष अत्यंत उत्साह से प्रतीक्षा करते हैं | 

जब श्रीभवानीशंकरजी की मूर्ति को सजाकर चांदी की पालकी में नगर भ्रमण के लिए ले जाया जाता था | तब हर वर्ष नियमानुसार शिराली के मंडी के व्यापारी दीपोत्सव कर आरती के साथ पालकी का स्वागत किया करते थेI एक वर्ष दुर्बुद्ध व्यापारी दुकानें जल्द बन्द कर चले गए |  जिस कारण पालकी को मार्ग में अंधरे में ही ले जाना पड़ा I परम पूज्य श्रीमत् कृष्णाश्रम स्वामीजी को इस घटना का पता चलने पर उन्होंने सहज कहा कि भगवान भवानीशंकर को जब जितना प्रकाश चाहिए वे स्वयं ही प्राप्त कर लेते हैं I व्यापारियों के दुष्कृत्य के परिणामस्वरूप अचानक ही मंडी में आग लग गई I लेकिन करुणामय परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी ने मठ के सेवकों को भेजकर आग को शीघ्र ही नियंत्रित करवा दिया साथ ही उन्होंने यह कहते हुए व्यापारियों को क्षमा कर दिया कि उनके प्रारब्धवश  ही उनके मन में ऐसे दुर्विचार आये थे | अत्यंत लोकप्रिय और श्रद्धेय परम पूज्य कृष्णाश्रम स्वामीजी ने वर्ष १८६३ में महासमाधि ग्रहण की I  उनकी समाधि शिराली मठ में परम पूज्य श्रीमत् परिज्ञानाश्रम स्वामीजी (द्वितीय) और परम पूज्य श्रीमत् केशवाश्रम स्वामीजी की समाधियों के बीच में प्रतिष्ठित है |

परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी एक महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक संस्कृत के प्रगाढ़ विद्वान, योगी, ज्योतिष शास्त्र में प्रवीण और, एक अत्यन्त कुशल प्रशासक थे | उन्होंने मठ में स्थित समाधि स्थलों की बाहरी वास्तु का और साथ ही मठ का नूतनीकरण करवाया | मठ के पास ही शिवगंगा सरोवर के निर्माण से मठ परिसर के सौन्दर्य की वृद्धि हुई और यह भक्तों के लिए भी लाभदायक सिद्ध हुआ | परम पूज्य स्वामीजी ने चित्रापुर गाँव के कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया | मठ के पास स्थित “गोवर्धन” नाम की एक छोटी पहाड़ी के ऊपर “पंचवटी” नाम की दुमंजिली सुन्दर इमारत बनवाई | शिराली गाँव से चित्रापुर मठ तक एक पक्की सड़क बनवाकर उसके दोनों ओर गृह निर्माण की व्यवस्था करवाई और रास्ते के दोनों ओर दीपस्तंभ लगवाए |  चित्रापुर अब एक सुरम्य क्षेत्र बन गया ।  

बाहरी विश्व से सुचारू रूप से संपर्क बना रहे इसलिए स्वामीजी की दूरदृष्टि के कारण एक डाक घर, मठ के करीब ही बनवाया गया जिससे लगा हुआ डाकघर के अधिकारी का आवास गृह भी था I  स्थानीय लोगों के बच्चों की कन्नड़ भाषा में प्राथमिक शिक्षा के लिए मठ के पास ही पाठशाला बनवाई | लोगों की दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि के लिए साप्ताहिक मंडी-बाजार की भी व्यवस्था परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी ने करवाई | इसमें कोई  संदेह नहीं कि अपनी दूरदृष्टि से परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी ने चित्रापुर को एक आदर्श गाँव बनाने के लिए भरसक प्रयत्न किये I मठ का परिसर और सुविधाएँ देखकर जनसामान्य ही नहीं अपितु अन्य गणमान्य अतिथि भी भूरि भूरि प्रशंसा करते नहीं चूकते थे | 

लेकिन जहाँ तक धर्म और नैतिक आचरण के मापदंडों के संरक्षण का सवाल था, परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी बड़े ही कट्टर थे | अपराधी व्यक्ति को आर्थिक दंड देना पड़ता था, जिसका उपयोग सामाजिक हित में किया जाता था | इसके अलावा समुद्र पार जाने वाले व्यक्ति को शुद्धिकरण के लिए प्रायश्चित्त भी करना पड़ता था I (उन दिनों समुद्र पार करने वाले ‘भ्रष्ट’ लोगों का समाज से बहिष्कार किया जाता था) I परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी की धारणा थी कि बाहर की भिन्न संस्कृतियों से प्रभावित होने से पहले सारस्वत समाज के लोग अपनी सांस्कृतिक जड़ें मजबूत कर अपने आप को संभाल लें | लेकिन समाज के एक वर्ग के द्वारा इस दृष्टिकोण को न समझ पाने के कारण कुछ विरोधभाव उत्पन्न होने लगा I इसके बावजूद बिना विचलित हुए पूज्य स्वामीजी इस वर्ग के लिए भी आशीर्वादपूर्वक प्रार्थना करते रहे | 

पूज्य स्वामीजी द्वारा केवल आशीर्वाद मात्र से अथवा पवित्र तीर्थ के सेवन के माध्यम से, चमत्कारिक रूप से रोग निवृत्ति, कानूनी विवाद, और अन्य सांसारिक समस्याओं को सुलझाने की कई अनगिनत घटनायें प्रसिद्ध हैं I  ऐसी ही दो घटनाओं का स्मरण  अक्सर किया जाता है – एक परम भक्त की घटना और दूसरी घटना निंदक की, जिनको स्वामीजी का भगवान दत्तात्रेय के रूप में साक्षात्कार हुआ | भक्त, परमानन्द से रोमांचित हुआ  और जो निंदक था वह परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी का आजीवन भक्त बन गया |  
अपने उपदेशों की ओर लोगों की उपेक्षा देख, परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी ने शिष्य स्वीकार न करने का निश्चय किया | लेकिन, वर्ष १९१५ में अचानक स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्होंने देवी आदेश के अनुसार शिष्य स्वीकार की घोषणा की I हरिदास रामचन्द्र भट जी के सुयोग्य द्वितीय सुपुत्र शान्तमूर्ति का चयन कर परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी ने उन्हें आश्रम संन्यास की दीक्षा दी और उन्हें स्वामी आनंदाश्रम नामाभिधान प्रदान किया |

इस महत्त्वपूर्ण शिष्यस्वीकार के केवल आठ दिनों बाद ही परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी ने मठाधिपत्य का उत्तरदायित्व अपने  सुयोग्य शिष्य को देकर महासमाधि ग्रहण की | श्री चित्रापुर मठ, शिराली में बड़ी समाधि के सम्मुख खड़े होने पर परम पूज्य पांडुरंगाश्रम स्वामीजी की पवित्र समाधि आपकी दाहिनी ओर स्थापित है |

पूर्वाश्रम के अपने नाम शान्तमूर्ति के अनुरूप ही शान्तचित्त धीरगंभीर और सदा सुस्मित परमपूज्य आनंदाश्रम स्वामीजी ने शिष्य स्वीकार के  कुछ ही दिनों बाद चित्रापुर सारस्वत समाज के नवम मठाधिपति के रूप में पीठारोहण किया | ज्ञानप्राप्ति की तीव्र लालसा के कारण पीठारोहण के तुरन्त बाद ही, परमपूज्य आनंदाश्रम स्वामीजी ने विद्वान कायकिणि सुब्राय भट जी से शास्त्र-अध्ययन करवाने का निवेदन किया | परमपूज्य आनंदाश्रम स्वामीजी ने कड़ी लगन और परिश्रम के साथ वेदान्त, संस्कृत भाषा, संस्कृत व्याकरण शास्त्र, न्याय शास्त्र इत्यादि विषयों का अभ्यास किया | परन्तु इन विषयों में प्रावीण्य प्राप्त के बावजूद, परमपूज्य स्वामीजी को अपने गुरु का अधिक सहवास न मिलने का दुःख था I आध्यात्मिक साधना में तीव्र अभिरुचि के बावजूद उनका अधिक समय मठ के प्रशासकीय उत्तरदायित्त्व को निभाने में व्यतीत होता था |

क्रमशः अपनी दिनचर्या में प्रतिष्ठित होकर परम पूज्य स्वामीजी ने मठाधिपति के सारे कर्तव्यों को सविनय, रूचिपूर्वक करना शुरू किया | परन्तु आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्ति के लिए योग्य आचार्य की नितांत आवश्यकता को जानकर उन्होंने गुरुशक्ति से योग्य मार्गदर्शन की ह्रत्पूर्वक  प्रार्थना की | निष्ठापूर्वक की गयी इस प्रार्थना का प्रत्युत्तर परम पूज्य स्वामीजी को गोकर्ण स्थित आदि मठ जाने पर मिला | वहाँ उनकी भेंट ऋषीकेश के विद्वान परमहंस स्वामी कृष्णाचार्य से हुई | परस्पर आदरभाव से परम पूज्य स्वामीजी को ऋषीकेश जाकर स्वामी कृष्णाचार्य परमहंस के साथ शास्त्र अध्ययन करने की इच्छा हुई I इस संकल्प में समाज का भी समर्थन पाकर परम पूज्य स्वामीजी ऋषीकेश की यात्रा पर चल पड़े | मार्ग में परम पूज्य स्वामीजी ने हुबली, पुणे, मुंबई और देहली में आशीर्वचन दिए | अपने परम पूज्य गुरु की विलक्षण प्रतिभा और आध्यात्मिक तेज को देख समाज अत्यंत प्रसन्न हुआ I 

ऋषीकेश में पारमार्थिक विषयों के गहरे अध्ययन में बिताया गया समय और स्वामी कृष्णाचार्य तथा अन्य संतों के साथ विचार विमर्श का काल, परम पूज्य स्वामीजी के लिए इच्छापूर्ति के साथ ही, बहुत बड़े मानसिक समाधान का काल  था | चित्रापुर वापस आते ही उन्होंने पुनः निस्वार्थ भाव से समाज के हित में कार्य करने का अपना व्रत आरम्भ किया | परम पूज्य स्वामीजी की विलक्षण विद्वत्ता और उनके मुख का तेज सैंकड़ो भक्तगणों को  चित्रापुर के वार्षिक रथोत्सव में सम्मिलित होने के लिए आकर्षित करता था  | परन्तु ग्रीष्म ऋतु की गरमी, पानी की कमी, पर्याप्त वैद्यकीय सुविधाओं का अभाव, आधारभूत संसाधनों की कमी और खर्च में लगातार होती वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, परम पूज्य स्वामीजीने वर्ष १९३९ में रथोत्सव को कुछ समय के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया | रथोत्सव के स्थान पर परम पूज्य स्वामीजी ने एक अनूठा कार्यक्रम “ साधना सप्ताह”  प्रस्तुत किया | यह एक सुनियोजित, सप्ताह भर चलने वाला सत्र था, जिसमें साधकों द्वारा विविध धार्मिक कार्यक्रम, जैसे, भजन, कीर्तन, जप इत्यादि कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे  | मौसम  का ध्यान रखते हुए साधना सप्ताह दिसंबर के महीने में रखा गया | इस वजह से साधकों की तरफ से साधना सप्ताह को बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला |

ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब कि समाज के सशंक  या भटके हुए व्यक्तियों को परम पूज्य स्वामीजी ने, जो मूर्तिमंत अनुकम्पा ही थे,  उचित मार्गदर्शन किया | एक विलक्षण घटना है, परम पूज्य स्वामीजी के बचपन के सहपाठी विट्टल सुब्राय भट परम पूज्य स्वामीजी को अपने सहपाठी की दृष्टि से देखते थे | उन्हें परम पूज्य स्वामीजी को अपना गुरु मानने में हिचकिचाहट होती थी |  इस दुविधा से छुटकारा पाने के लिए विचार करने उनकी  आँखों के सामने, बार बार, परम पूज्य स्वामीजी की प्रतिमा आने लगी | अंत में वे  तुरंत ही परम पूज्य स्वामीजी के पास गए और उनसे यह कहते हुए मनःपूर्वक क्षमा याचना की, कि उन्होंने परम पूज्य स्वामीजी की महिमा को आज तक नहीं समझा था |   

परम पूज्य स्वामीजी द्वारा लिखे गए श्री गुरुपरंपरा स्तोत्र के एक भाग से एक ऐतिहासिक जानकारी मिलती है | हमारी विद्यमान गुरुपरंपरा वर्ष १७०८ में परम पूज्य परिज्ञानाश्रम स्वामीजी प्रथम के गोकर्ण स्थित कोटितीर्थ सरोवर के पास आगमन के साथ प्रारंभ हुई | परम पूज्य स्वामीजी ने, वर्ष १७०८  के पूर्व हुए हमारे गुरुओं के नाम संशोधित कर भावी पीढ़ियों के लिए इस इस स्तोत्र की रचना की है | वे नाम हैं, परम पूज्य श्रीमद् अच्युताश्रम स्वामीजी, परम पूज्य श्रीमद् आनंदश्रम स्वामीजी, परम पूज्य श्रीमत् कैवल्याश्रम स्वामीजी, परम पूज्य श्रीमत् नृसिम्हाश्रम स्वामीजी, परम पूज्य श्रीमत् केशवाश्रम स्वामीजी, परम पूज्य श्रीमत् वामनाश्रम स्वामीजी, परम पूज्य श्रीमत् कृष्णाश्रम स्वामीजी, परम पूज्य श्रीमत् पांडुरंगाश्रम स्वामीजी, और अन्त में परम पूज्य श्रीमत् परिज्ञानाश्रम स्वामी (प्रथम) — जिनसे विद्यमान परंपरा स्थापित हुई इसलिए हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि श्री चित्रापुर मठ का ३०० से भी  अधिक वर्षों का इतिहास तो केवल ज्ञात परम्परा है, जिस के बारे में हमें बहुत अधिक जानकारी है, और इस के बारे में हमारे पास अभिलेख भी प्राप्त हैं | परन्तु परम पूज्य आनन्दाश्रम स्वामीजी ने जो पूर्वाचार्यों के नाम प्रकट किये, यही  प्राचीन  गुरुपरंपरा हमें  विरासत के रूप में मिली है |     

स्वधर्म के सिद्धांतों का पालन, वेदान्त का अध्ययन और परमार्थ में प्रगति के लिए प्रयत्नशील रहना, साधकों में ये मुख्य गुण हों, इस पर परम पूज्य स्वामीजी का सदैव आग्रह रहता था | लेकिन समाज में बढ़ते अविश्वास के कारण  शिष्य स्वीकार के बारे में परम पूज्य स्वामीजी ने अपने गुरु श्रीमत् पांडुरंगाश्रम स्वामीजी की तरह ही  सोचा कि  मठ की उन्नति हेतु शिष्यस्वीकार करना न तो आवश्यक है और न ही सुसंगत  परन्तु समाज के एक दो अग्रगण्य व्यक्तियों के आग्रह पर परम पूज्य स्वामीजी ने अपने पीठारोहण के रौप्य महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित समारंभ में उचित समय आने पर शिष्य ग्रहण कर, शिष्य को दीक्षा देने की घोषणा की, कि १९५८ के चातुर्मास्य व्रत के बाद, यह शिष्यस्वीकार होगा |

इस घोषणा के अनुसार, वर्ष १९५९ के मार्च माह की १ ली तारीख को ९ वर्ष आयु के रवींद्र शंकरानारायण शुक्ल को भक्त गणों के एक विशाल समुदाय की उपस्थिति में मुंबई के शिवाजी पार्क मैदान में शिष्य स्वामी पद की दीक्षा दी गयी |  अगले सात साल तक परम पूज्य श्रीमद् आनंदाश्रम स्वामीजी ने इस समर्पित शिष्य को संस्कृत भाषा, संस्कृत व्याकरण, न्याय शास्त्र और धर्मग्रंथों का अध्ययन करवाकर तैयार किया | वर्ष १९६६ के सितम्बर माह में, परम पूज्य श्रीमद् आनंदाश्रम स्वामीजी ने बेंगलुरु मठ में महासमाधि ग्रहण की  | उनकी समाधि, श्री चित्रापुर मठ शिराली में, परम पूज्य श्रीमत् पांडुरंगाश्रम स्वामीजी की समाधि के पार्श्व में स्थापित है | 

गुरु स्वामीजी की महासमाधि के पश्चात् तीक्ष्ण बुद्धि, प्रगतिशील, दूरदृष्टि, गहन आध्यात्मिक ज्ञानपिपासा  तथा तकनीकी विषयों में भी उतनी ही रूचि रखनेवाले परम पूज्य श्रीमत् परिज्ञानाश्रम स्वामी जी को युवावस्था में ही, श्री चित्रापुर मठ के दशम मठाधिपति के पद पर पीठारोहण करना पड़ा | पवित्र पीठासन ग्रहण करने के बाद, परम पूज्य श्रीमत् परिज्ञानाश्रम स्वामीजी का पहला ही आशीर्वचन सुन समाज मन्त्रमुग्ध और अवाक् सा हो गया | पूज्य स्वामीजी ने अपने प्रथम आशीर्वचन  के समापन में कहा  “यह हमारी उत्कट आकांक्षा है, कि समाज की धर्मनिष्ठा और मठ की ओर भक्ति अधिक बढ़े | हम ह्रत्पूर्वक आशा करते हैं, कि परंपरा से चले आये धार्मिक संस्कार और रीति रिवाज, हमारे अर्चकों और भक्तगणों के परस्पर सहयोग से पहले जैसे उत्साह के साथ भविष्य में भी बने रहें | श्री भवानीशंकरजी आप सब को शान्ति, समाधान और सुरक्षा प्रदान करें I” 

समाज को आध्यात्मिक प्रगति के लिए मार्गदर्शन करने के साथ ही, परम पूज्य स्वामीजी ने समाज कल्याण के लिए कई कदम उठाए और कई योजनायें कार्यान्वित कीं | चित्रापुर गाँव को “चित्रापुर ग्राम विकास योजना” अंतर्गत खेती उद्योग और व्यापार में आत्मनिर्भर बनाने का उन्होंने भरसक प्रयास किया | मठ के आस पास लघु उद्योग, जैसे कि मुद्रणालय, हथकरघा, बिजली पर चलने वाले करघे, कृषि-उद्योग, और समाज के निराश्रित वरिष्ठों के लिए, भक्त गणों से प्राप्त दान राशि से “आनंदाश्रय” नामक  निःशुल्क आवास का निर्माण किया | 

परम पूज्य श्रीमत् पांडुरंगाश्रम स्वामीजी द्वारा पंचवटी पर बनवाये गए ध्यान मंदिर का परम पूज्य स्वामीजी ने नूतनीकरण कर उसके आसपास एक सुन्दर उद्यान बनवाया |  गोवर्धन पहाड़ी पर हिरण और पक्षियों के लिए उपवन की व्यवस्था की | दूर संचार में भी परम पूज्य स्वामीजी की अभिरुचि थी और परम पूज्य स्वामीजी ने बेतार यंत्रों द्वारा  “हॅम रेडियो” की स्थापना की, जिससे आपातकाल में सुदूर इलाकों से भी संपर्क किया जा सके |  

परम पूज्य स्वामीजी ने समाज की सांस्कृतिक धरोहर को सशक्त करने, रथोत्सव से संबंधित विशिष्ट विधि-विधानों को बनाये रखने के लिए और विशेषकर अपने पूज्य गुरु के प्रति आदर एवं सम्मानपूर्वक श्री चित्रापुर रथोत्सव को फिर से शुरू किया I (वर्ष १८६२ में शुरु किया गया यह रथोत्सव, परिस्थितिवश वर्ष १९३९ में स्थगित किया था )I रथोत्सव की तैयारी करते समय अचानक प्राप्त एक प्राचीन नक्षीदार दीपमाला से परम पूज्य स्वामीजी के मन में पुरातन वस्तुओं के लिए एक संग्रहालय बनवाने की इच्छा जागृत हुई और इसके लिए उन्होंने भरसक प्रयास किये |  बहुमूल्य मूर्तियाँ, उपेक्षित पुराने घरों में या मंदिरों के खंडहरों में पड़ी हुई कलाकृतियाँ पूज्य स्वामीजी ने एकत्रित की I  इसके लिए परम पूज्य स्वामीजी को अक्सर दूर दूर तक या घने जंगलों में पैदल ही जाना पड़ता था | इस संग्रहालय के लिए परम पूज्य स्वामीजी ने दुर्लभ पाण्डुलिपियों का तथा पुरानी दुर्लभ पुस्तकों का भी संचय किया |

मठ को आत्मनिर्भर बनाने हेतु, परम पूज्य स्वामीजी ने मठ की बेन्ग्रे और केम्ब्रे स्थित जमीन पर नारियल के वृक्ष लगवाये I मठ को पर्याप्त दूध की प्राप्ति करवाने के लिए एक गोशाला का भी निर्माण करवाया I खाली पड़ी हुई मठ की एक जमीन पर परम पूज्य स्वामीजी ने एक छह मंजिली व्यावसायिक इमारत बनवाई, जिसके किराए से मठ को नियमित, संतोषजनक आमदनी होने लगी |  
परम पूज्य स्वामीजी चित्रापुर को एक आदर्श ग्राम में परिवर्तित करने के लिए भरसक प्रयत्न कर रहे थे I वे  युवा पीढ़ी को शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से सक्षम बनाने, समाज को संस्कृत अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करने, हमारे अर्थगर्भित संस्कारों और धार्मिक विधियों पर मनन करने, धरोहर स्वरुप प्राप्त अपनी और संस्कृति को सुरक्षित रखने के उपाय ढूंढने, और “हॅम रेडियो” के माध्यम द्वारा चित्रापुर समाज को सुदूर स्थित विस्तृत बाहरी जगत से जोड़ने की चेष्टा कर रहे थेI किंतु समाज के कुछ व्यक्ति अपनी अपरिपक्वता के कारण परम पूज्य स्वामीजी की दूरदर्शिता को न तो समझ पाए न अपना पाए | परम पूज्य स्वामीजी की सोच, इन क्षुद्र विचारधारा के व्यक्तियों की मानसिकता से कोसों आगे थी | परम पूज्य स्वामीजी जानते थे कि समयानुसार आवश्यक सकारात्मक परिवर्तनों को स्वीकार करने का सामर्थ्य इस वर्ग में नहीं है I कालान्तर में परम पूज्य स्वामीजी ने मठाधिपत्य त्यागकर  महाराष्ट्र में लोणावला शहर के पास स्थित कार्ला ग्राम में जाकर बसने का निश्चय किया |

लेकिन औपचारिक उपाधि के त्याग से गुरु का उत्तरदायित्व समाप्त नहीं हुआ I श्री ट्रस्ट नामक एक संस्था स्थापित कर, मुंबई के पास विरार उपनगर में परम पूज्य स्वामीजी ने दिव्याङ्गों के लिए एक पाठशाला की स्थापना की I “शान्तसुखदा” नामक एक अन्य संस्था बनायी गई जो पूज्य स्वामीजी के कार्ला स्थित आश्रम के आस पास बसी हुई जनजातियों के हित में कार्य कर सके |  

१५ जून १९९१ के दिन, उनके ४४ वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आयोजित एक समारोह के अवसर पर अपने आशीर्वचन में पूज्य स्वामीजी ने कहा कि उन्होंने अपने परम पूज्य गुरु, स्वामी आनंदाश्रमजी के संकल्पों को सिद्ध करने का पूरा प्रयास किया है  और यह प्रयास वे अपने गुरु के चरणों में समर्पित कर रहे हैं I उसी वर्ष अगस्त की २९ तारीख को परम पूज्य परिज्ञानाश्रम स्वामीजी (तृतीय) ने बेंगलुरु शहर में महासमाधि ग्रहण की, जिसके पश्चात् विधि विधान पूर्वक कार्ला में उनकी  पावन समाधि की प्रतिष्ठा की गई I 

गुरुशक्ति के अपार अनुग्रह से भक्त गण कई तरह के अलौकिक चमत्कारों का अनुभव करते हैं | परम पूज्य स्वामीजी की तीव्र इच्छा थी कि कार्ला में एक ध्यान मंदिर बनवाकर देवी दुर्गा परमेश्वरी की मूर्ति की स्थापना की जाए | यह संकल्प वर्ष १९९३ के फरवरी महिने में कार्ला क्षेत्र में सिद्ध हुआ | समाधि पर शिवलिंग की प्रतिष्ठा के समय समाधि को खुलवाते ही अचानक ही चंदन की सुगंध वहाँ फैल गई I परम पूज्य स्वामीजी के मस्तक पर अर्पित की गई १०८ रुद्राक्षों की माला, गुलाब के दो सुगंधित  पुष्प, कुछ बिल्व पत्र और तुलसीदल पूर्ववत् ताजे दिखाई दिए I  इतना ही नहीं, जिस वस्त्र में यह सामग्री बंधी हुई थी उसकी नमी भी ज्यों की त्यों कायम थी I आश्चर्यचकित और भावुक श्रद्धालुओं ने इस चमत्कार के भक्तिपूर्वक भावभीने दर्शन किए I उसके उपरान्त लिंग प्रतिष्ठा कर, समाधि को पूर्ववत् बंद कर दिया गया | 

जिस पावन गुरु परम्परा का आश्वासन सारस्वत समाज का निरंतर आध्यात्मिक मार्गदर्शन करता आ रहा था, समाज अब उस आलंबन से  वंचित हो गया I फलस्वरूप कई वर्षों तक सारस्वत समाज, पावन गुरुपरम्परा के सुरक्षात्मक कवच के अभाव में पूर्णतया आधारहीन और निराश्रित रहा I अन्ततोगत्वा, प्रथम गुरु प्राप्ति के पुनः स्मरण से प्रेरणा लेकर समाज के वरिष्ठों ने गोकर्ण स्थित आदि मठ में परम पूज्य प्रथम परिज्ञानाश्रम स्वामीजी की समाधि के समक्ष गुरु परम्परा की निरंतरता हेतु पुनः गुरु प्राप्ति के लिए तीव्र प्रार्थना की I प्रार्थना के समय इन वरिष्ठों ने भावी मठाधिपति के चयन के लिए कुछ प्रस्ताव समाधि स्थल पर समर्पित किये थे | प्रार्थना के बाद माउन्ट अबू स्थित पूज्य ईश्वरानंद गिरिजी महाराज के आश्रम में तीव्र साधना कर रहे युवा सारस्वत सन्यासी से संपर्क करने का स्पष्ट संकेत और आशीर्वाद प्राप्त हुआ |   

यही हमारे परमप्रिय, विद्यमान मठाधिपति श्रीमत् सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी हैं I इन्होंने इस दैवी संकेत के लगभग १२ वर्ष पहले, परम पूज्य परिज्ञानाश्रम स्वामीजी (तृतीय) की अनुज्ञा और आशीर्वाद लेकर माउन्ट अबू स्थित आश्रम में प्रवेश किया था I शायद इसी कारणवश करुणामयी गुरुशक्ति ने पूर्वाश्रम के समीर कोडिकल को युवावस्था में ही सामाजिक अशांति से दूर, शांत वातावरण में तीव्र साधना द्वारा सर्वतोपरी तैयारी के लिए माउंट अबू भेजा ताकि वे समयानुसार चित्रापुर सारस्वत समाज के ११ वें मठाधिपति के रूप में, इस समाज की उज्जवल गुरुपरंपरा को आगे बढ़ाने में सक्षम हों I आगे चलकर इसके अनुरूप ही उन्होंने गुरुविहीन व्याकुल चित्रापुर सारस्वत समाज के आध्यात्मिक विकास के लिए गुरु रूप में  सुयोग्य नेतृत्व प्रदान किया | गोकर्ण मठ में प्राप्त आशीर्वाद के अनुसार समाज के वरिष्ठों ने माउंट अबू जाकर पूज्य ईश्वरानंद गिरिजी महाराज से श्री चित्रापुर मठ के मठाधिपत्य के लिए उनके युवा सारस्वत शिष्य की याचना की I इस याचना के फलस्वरूप पूज्य ईश्वरानंद गिरिजी महाराज के आशीर्वाद और सारस्वत समाज के सौभाग्यवश पूज्य सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी ने श्री चित्रापुर मठ के ग्यारहवें मठाधिपति का पद ग्रहण करने की स्वीकृति दी I इस प्रकार इस छोटे से परन्तु भाग्यवान चित्रापुर सारस्वत समाज में सामाजिक पुनरुत्थान और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का अभ्युदय, वर्ष १९९७ के फरवरी माह की २७ तारीख को हुआ |

परम पूज्य सद्योजात शंकराश्रम स्वामीजी ने, श्रृंगेरी पीठ के महास्वामी, विश्ववन्दित जगद्गुरु शंकराचार्य श्री भारतीतीर्थ महास्वामी जैसे अनेक साधुपुरुषों के आशीर्वाद से मठाधिपत्य का पदभार ग्रहण किया और तब से लेकर आज तक उन्होंने चित्रापुर सारस्वत समाज के हर वर्ग  को भक्ति की प्रेरणा देकर गुरु, मठ और ईश्वर से दृढ़ संबंध बनाए रखने की आध्यात्मिक विरासत को बढ़ावा दिया है |    

जो भक्तगण सुरम्य श्री चित्रापुर मठ में आते हैं या जो भी परम पूज्य स्वामीजी के भारत भर में होने वाले किसी शिबिर में भाग लेते हैं, वे आध्यात्मिक साधना का आनंद प्राप्त करते  हैं | अनेक साधकों ने परम पूज्य स्वामीजी से मन्त्र दीक्षा प्राप्त की है | परम पूज्य स्वामीजी को षोडशोपचार पूजा करते देख, वे पूजा की विधि की सूक्ष्मता को सीखते हैं I  परम पूज्य स्वामीजी द्वारा संचालित स्वाध्यायों से उन्हें हमारे शास्त्रों के गूढार्थ का ज्ञान होता है | परस्पर संवादात्मक विमर्श और परामर्श--सत्रों में, साधक अपनी शंकाओं का निराकरण कर लेते हैं | परम पूज्य स्वामीजी द्वारा संचालित ध्यान शिविरों में वे अपनी सांसारिक चिंताओं से ऊपर उठकर अपूर्व शांति और आनंद के कुछ अमूल्य क्षणों का अनुभव करते हैं |  

शारीरिक और मानसिक बलवर्धन के लिए और अपनी संस्कृति से परिचय करवाने के लिए परम पूज्य स्वामीजी ने प्रार्थना (आयु – वर्ष १५ तक) और युवधारा (आयु- वर्ष १५ से ३५ तक) इन दो वर्गों की स्थापना की | इनके माध्यम से बच्चों और युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ कर अपरिमित शक्ति और सामर्थ्य का बोध कराया जाता है I नैतिक संस्कारों का आधार लेकर युवाओं को प्रतिस्पर्धात्मक जगत की असुरक्षितता और भय से छुटकारा पाने के लिए उचित कार्यक्रमों के माध्यम से आत्मबल के विकास हेतु मार्गदर्शन दिया जाता है I     

परम पूज्य स्वामीजी के अमूल्य निर्देशन में कार्यरत अनेक दानशील संस्थाओं ने ( जैसे कि श्रीवल्ली ट्रस्ट, परिज्ञान फौंडेशन इत्यादि) शिराली और आस पास के कई ग्रामों की जनता को जाति पांति के किसी बंधन के बिना, आत्मविश्वासपूर्वक बेहतर जिंदगी जीने की राह दिखाई है | इन संस्थाओं में विविध क्षेत्रों में कार्यरत अनेक अनुभवी स्वयंसेवक सेवा भाव से अपना योगदान देते हैं I 

चित्रापुर ग्राम को पुनरुज्जीवित करने के लिए परम पूज्य स्वामीजी ने कई उपक्रम कार्यान्वित किये - स्वच्छ पानी की व्यवस्था, माध्यमिक शाला, जिसमें विद्यार्थियों को निशुल्क यूनिफॉर्म और निशुल्क मध्यान्ह भोजन  की व्यवस्था की गयी  हैI ग्राम की  महिलाओं के लिए सिलाई और कढ़ाई सिखाकर स्त्री शक्ति को बढ़ावा देने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने हेतु, संवित सुधा नामक संस्था, एक व्यायामशाला, सामाजिक, सामूहिक  समारोहों  के लिए एक विशाल भवन, श्रीमत् परिज्ञानाश्रम वस्तु संग्रहालय, परिमोचन परियोजना जिसके अंतर्गत किसानों और मछुआरों को आसान किश्तों पर ऋण उपलब्ध करवाया  जाता है और आवश्यकता पड़ने पर तज्ञ व्यक्तियों से परामर्श  की भी व्यवस्था की जाती है, ये कुछ उदाहरण  यहाँ  उद्धृत  किये हैं | इसी के साथ, स्वामी परिज्ञानाश्रम हस्त-निर्मित कागज कारखाना, जिसमें स्थानीय महिलाओं को रोजगार दिया जाता है | इन उपक्रमों के सकारात्मक परिणामस्वरूप  इस ग्राम में रोजगार  न मिलने के कारण ग्राम छोड़कर शहरों की ओर जानेवाले ग्रामीणों की संख्या भी कम हो गयी | यही नहीं बल्कि, इन उपक्रमों से निर्मित नूतन अवसरों ने सेवा से प्राप्त होनेवाले आनंददायक अनुभवों  द्वारा अन्य शहरों से आने वाले साधकों में एक नया उत्साह पैदा किया है I  

इस साधना-पथ पर मील के पत्थर की तरह हरेक सफलता का श्रेय जिस तरह परम पूज्य स्वामीजी, संपूर्ण विनम्रता और समर्पण भाव से, अपने गुरु परम पूज्य स्वामी परिज्ञानाश्रम (तृतीय ) के दैवी संकल्प को ही देते हैं, उससे समूचे चित्रापुर सारस्वत समाज की आध्यात्मिक महत्वाकांक्षाओं में एक जागृति  आई  है I  इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि एक आदर्श शिष्य अपनी व्यक्तिगत लौकिक सफलताओं एवं उपलब्धियों के बावजूद भी अपने परम    लक्ष्य को अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देता |